
यह कविता आधुनिक समाज में बढ़ती स्वार्थपरता, जाति-धर्म आधारित भेदभाव और मानवीय मूल्यों के पतन पर तीखा प्रहार करती है। रचना बताती है कि शिक्षा और सभ्यता के दिखावे के बीच इंसानियत और जमीर किस तरह कमजोर होते जा रहे हैं।
- तहज़ीब के पीछे छुपा सच
- रिश्तों में स्वार्थ का ज़हर
- इंसानियत के चेहरे पर दाग
- डिग्रियों के दौर में मरता जमीर
डॉ. सत्यवान सौरभ
नस्ल देखकर ही रखें, ताल्लुक़ अब हर हाल।
दिमाग शिक्षा ने दिए, जमीर हुए हलाल।।
चेहरों पर तहज़ीब है, भीतर गहरा दाग,
बातों में इंसानियत, दिल में जलती आग।।
डिग्री वाली भीड़ में, सजते रोज़ पंडाल—
नस्ल देखकर ही रखें, ताल्लुक़ अब हर हाल।।
ऊँची-ऊँची सोच का, करते खूब प्रचार,
घर की चौखट पर मगर, मर जाता व्यवहार।।
जाति, धर्म, औक़ात पर, उठता रोज़ बवाल—
नस्ल देखकर ही रखें, ताल्लुक़ अब हर हाल।।
रिश्तों की बुनियाद अब, मतलब की दुकान,
नेह, वफ़ा, एहसास सब, लगते हैं अनजान।।
जिसको जितना लाभ हो, उतनी उसकी चाल—
नस्ल देखकर ही रखें, ताल्लुक़ अब हर हाल।।
इल्म अगर इंसान को, सिखा न पाए प्यार,
ऐसी सारी रोशनियाँ, कहलाएँ अंधियार।।
ईमानों के शहर में, बिकते रोज़ दलाल—
नस्ल देखकर ही रखें, ताल्लुक़ अब हर हाल।।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)








