
यह कविता आधुनिक रिश्तों में बढ़ते स्वार्थ, छल और विश्वासघात की पीड़ा को व्यक्त करती है। कवयित्री ने दिखावटी अपनत्व के पीछे छिपे भावनात्मक आघात और सच्चे प्रेम की कमी को मार्मिक शब्दों में उकेरा है।
- रिश्तों में छुपे वार
- अपनों के बीच अकेलापन
- स्वार्थ में खोते संबंध
- विश्वास पर होते प्रहार
डॉ. प्रियंका सौरभ
लगता खूब अजीब है, रिश्तों का संसार,
अपने ही लटका रहें, गर्दन पर तलवार॥
चेहरों पर मुस्कान है, भीतर गहरा वार,
मीठी बोली में छुपा, छल का सारा सार।
विश्वासों की नींव पर, होते रोज़ प्रहार—
सौरभ, खूब अजीब है रिश्तों का संसार॥
अपनों की इस भीड़ में, गायब सच्चा प्यार,
पीठ पीछे वार कर, करते रोज़ प्रहार।
नेह-नदी सूख गई, टूटा हर व्यवहार—
सौरभ, खूब अजीब है रिश्तों का संसार॥
स्वार्थों की इस आग में, जलते सब संस्कार,
दिख जाए जब फायदा, बदलें सभी विचार।
सच्चे दिल की राह पर, मिलता तिरस्कार—
सौरभ, खूब अजीब है रिश्तों का संसार॥
जागो अब इंसान तुम, समझो यह व्यवहार,
सत्य-प्रेम के साथ ही, रहें संबंध प्यार।
वरना हो अलगाव बस, सौरभ बारंबार—
सौरभ, खूब अजीब है रिश्तों का संसार॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)






