
यह लघु कथा वृद्ध दंपत्ति के आपसी प्रेम, चिंता और समझदारी को दर्शाती है। दोनों एक-दूसरे को जीवन के आवश्यक कार्य सिखाकर भविष्य के लिए आत्मनिर्भर बनते हैं। अंततः उनका सहयोग ही उन्हें मानसिक शांति और संतोष प्रदान करता है।
- साथ निभाने का सच्चा अर्थ
- जीवनसाथी का असली सहारा
- बुढ़ापे में आत्मनिर्भरता की सीख
- प्रेम, समझ और आत्मनिर्भरता की कहानी
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे के लिए चिंतित रहते थे। पता नहीं, पहले पहल आखिरी सांस कौन ले और फिर आगे क्या होगा…! मृत्यु का अटल सत्य पति को भी मालूम था और पत्नी को भी। दोनों का मोह एक-दूसरे के प्रति गहरा था।
पति चाहता था कि पत्नी बैंक, डाकघर एवं एलआईसी, अन्य कार्यालयों के बारे में जाने, इंटरनेट सीखे, ताकि कागजी कार्य सहजता से कर पाए और ऑनलाइन कार्य भी स्वयं ही कर पाए। और पत्नी चाहती थी कि पति देव स्वयं घर के कार्य सीख लें, जैसे—खाना बनाना, कपड़े धोना, साफ-सफाई आदि।
बहुत सोचने के उपरांत एक दिन एक-दूसरे ने उक्त समस्या पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। पति पत्नी को साथ लेकर कार्यालयों के फॉर्म आदि भरना सिखाया, स्मार्टफोन से इंटरनेट चलाना सिखाया और भी जरूरी कार्य सिखाए। वहीं पत्नी ने भी बीमारी का बहाना बनाकर पति महोदय से खाना बनाना व घर के अन्य कार्यों को करने की कला भी सिखा दी। अब वे दोनों निश्चिंत थे।
वृद्धावस्था का दर्द उन्हें कमजोर नहीं कर रहा था। मन हल्का हो चुका था। तृप्त भाव से पति-पत्नी जीवन का आनंद लेने लगे।
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, पोस्ट तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश 283111








