
यह लेख महिला सुरक्षा संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते गंभीर सवालों को उजागर करता है। अंधविश्वास, राजनीतिक हस्तक्षेप और संस्थागत कमजोरी कैसे महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित कर रहे हैं, इसका विश्लेषण किया गया है।
- अंधविश्वास और राजनीति के बीच महिला सुरक्षा
- महिला आयोग की साख पर सवाल
- जब संस्थाएँ ही कमजोर पड़ जाएँ
- नारी सुरक्षा बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप
डॉ. सत्यवान सौरभ
महाराष्ट्र महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष रूपाली चाकणकर द्वारा एक बलात्कार आरोपी ज्योतिषी अशोक खरात उर्फ कैप्टन के पैर धोने का दृश्य सोशल मीडिया पर फैलते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर बने संस्थानों की आंतरिक कमजोरी का प्रतीक है। एक ऐसे व्यक्ति के चरणों में नतमस्तक होना, जिस पर 58 महिलाओं के यौन शोषण, गुप्त कैमरे लगाने और नशीले पदार्थों के माध्यम से अंधविश्वास का लाभ उठाने के आरोप हैं, नारीवाद के सिद्धांतों पर गहरा आघात है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर चाकणकर ने 20 मार्च 2026 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन प्रश्न बना हुआ है—क्या यह राजनीतिक नियुक्ति प्रणाली का परिणाम है?
भारतीय संदर्भ में महिला आयोग राज्य स्तरीय संस्थाएँ हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 15 और 39 के अंतर्गत महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए स्थापित की गई हैं। लेकिन जब इन संस्थाओं का प्रमुख स्वयं एक आरोपी के प्रति श्रद्धा दिखाए, तो पीड़ित महिलाओं का विश्वास कैसे बनेगा? नासिक पुलिस ने खरात के फार्महाउस से 58 आपत्तिजनक वीडियो बरामद किए, जो यह सिद्ध करते हैं कि अंधविश्वास कितना खतरनाक हो सकता है। यह घटना हमें सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी स्तर पर गंभीर चिंतन के लिए बाध्य करती है।
अशोक खरात कोई साधारण ज्योतिषी नहीं था। वह ‘कैप्टन’ के नाम से जाना जाता था, जो नेताओं से लेकर आम महिलाओं तक को अपनी कथित पूजा-पाठ और हस्तरेखा देखने के बहाने फँसाता था। पुलिस जाँच में सामने आया कि उसने फार्महाउस पर गुप्त कैमरे लगाए थे, महिलाओं को नशीला पदार्थ पिलाया और उनका शोषण किया। पेन ड्राइव में 58 वीडियो मिले, जो उसके अपराधों के ठोस प्रमाण हैं। नासिक के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि खरात की संपत्ति लगभग 200 करोड़ रुपये की है, जो शोषण के माध्यम से अर्जित की गई है।
भारत में अंधविश्वास का यह बाजार नया नहीं है। तंत्र-मंत्र, ज्योतिष और तथाकथित बाबाओं का प्रभाव ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों तक फैला हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार, 2024 में अंधविश्वास से जुड़े अपराधों में 15 प्रतिशत वृद्धि हुई है। खरात ने कई नेताओं के हाथ देखे, जिनमें रूपाली चाकणकर भी शामिल थीं। एक वीडियो में वे यह कहते हुए दिखाई देती हैं कि “आप जैसे महापुरुष दुर्लभ हैं।” यह श्रद्धा किस प्रकार अपराधी को संरक्षण देती है, यह गंभीर विचार का विषय है। राजनीतिक प्रभाव के कारण आरोपी को छूट मिली, जो व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।
रूपाली चाकणकर भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं, जिन्हें महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। वीडियो सामने आने के बाद विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग की। उन्होंने ‘व्यक्तिगत कारणों’ से इस्तीफा दे दिया, परंतु विशेष जाँच दल की जाँच जारी है। क्या वे आरोपी की सहयोगी थीं? विपक्ष ने उन्हें सह-आरोपी बनाने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने तत्काल इस्तीफे का निर्देश दिया, जो सराहनीय कदम है। यह घटना राजनीतिक नियुक्ति प्रणाली की समस्या को उजागर करती है, जहाँ योग्यता की बजाय वफादारी को प्राथमिकता दी जाती है।
महिला आयोग का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन वास्तविकता अलग है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 30 प्रतिशत महिलाएँ घरेलू हिंसा का सामना करती हैं, लेकिन आयोगों तक पहुँचने वाली शिकायतें 5 प्रतिशत से भी कम हैं। इसका कारण जागरूकता की कमी, भय और राजनीतिक दबाव है। हरियाणा जैसे राज्यों में भी यही स्थिति है, जहाँ अंधविश्वास और बाबाओं का प्रभाव अधिक है और राजनीतिक नेता इन्हें वोट बैंक के लिए बढ़ावा देते हैं।
अंधविश्वास महिला शोषण का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। कई तथाकथित बाबा ‘काला जादू हटाने’ के नाम पर महिलाओं का शोषण करते हैं। शिक्षा के बावजूद अंधविश्वास का बढ़ना चिंताजनक है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 40 प्रतिशत लोग अंधविश्वास पर विश्वास करते हैं। महिला सशक्तिकरण के दावों के बीच यह एक विडंबना है। कानून के अनुसार, भारतीय दंड संहिता की धारा 376, पोक्सो कानून और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम ऐसे अपराधों को नियंत्रित करते हैं। फिर भी सजा की दर 30 प्रतिशत से कम है। त्वरित सुनवाई की कमी के कारण अपराधी खुले घूमते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हुसैनआरा खातून मामले में त्वरित सुनवाई को संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना था।
महाराष्ट्र में विशेष जाँच दल का गठन एक सकारात्मक कदम है, लेकिन पारदर्शिता आवश्यक है। सुझाव के रूप में महिला आयोगों को स्वायत्त बनाया जाना चाहिए, राजनीतिक नियुक्तियों को रोका जाना चाहिए, अंधविश्वास विरोधी कानून को मजबूत किया जाना चाहिए (जैसे झारखंड मॉडल), और डिजिटल माध्यमों से जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। साथ ही, पुलिस प्रशिक्षण में लैंगिक संवेदनशीलता को शामिल किया जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर विश्व आर्थिक मंच की जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत का स्थान 127वाँ है।
ऐसी घटनाएँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक छवि प्रस्तुत करती हैं। अन्य देशों में #MeToo आंदोलन इसलिए सफल हुआ क्योंकि वहाँ की संस्थाएँ अधिक मजबूत थीं। भारत को भी इससे सीख लेनी चाहिए। रूपाली चाकणकर प्रकरण एक आईना है, जो दिखाता है कि जब तक संस्थाएँ राजनीति की भेंट चढ़ती रहेंगी, तब तक महिला सुरक्षा केवल एक दावा बनी रहेगी। अंधविश्वास का अंत शिक्षा से और राजनीतिक दुरुपयोग का अंत सुधार से ही संभव है। समाज, सरकार और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा, अन्यथा पीड़ितों की संख्या बढ़ती ही जाएगी।
✍ डॉ. सत्यवान सौरभ
📍333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी), भिवानी, हरियाणा







