
साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का कार्य करता है और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। लेखन समाज को जागरूक करने का माध्यम है, लेकिन साहित्यकारों को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा। समाज और संस्थाओं को योग्य साहित्यकारों को सम्मानित करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
- समाज निर्माण में साहित्यकार की भूमिका
- लेखनी से समाज को नई दिशा
- साहित्यकारों को प्रोत्साहन की आवश्यकता
- सम्मान और जिम्मेदारी का प्रश्न
सुनील कुमार माथुर
साहित्यकार समाज को अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को एक नई दशा व दिशा प्रदान करता है। वे सदैव समाज को सजग व जागरूक रखने का प्रयास करते हैं। वे केवल मनोरंजन के लिए ही अपनी ठनठनी कलम नहीं चलाते हैं, अपितु जनता-जनार्दन को ऐसा साहित्य देते हैं, जिसे पढ़ने के बाद उनके जीवन में निखार आए। जनता नकारात्मक सोच को छोड़कर सकारात्मक सोच को अंगीकार करें।
साहित्यकार की लेखनी न केवल आज की पीढ़ी को ही, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी बेहद सौम्य, गरिमामय और विश्वसनीय अंदाज़ में अपनी शानदार प्रस्तुति देती है। उनकी लेखनी और प्रस्तुति में एक अलग ही शांति और भरोसा होता है, जो पाठकों को सहज ही अपनी ओर खींच लेता है। इतना ही नहीं, पाठकों को एक संस्कारी और सम्मानजनक पहचान भी देते हैं।
साहित्यकारों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसलिए वे लेखन से पहले हर विषय पर हर वक्त गहन चिंतन-मनन करते रहते हैं और फिर जाकर अपना लेखन निस्वार्थ भाव से करते हैं तथा जन-जन तक अपनी आवाज, बात व लेखनी को पहुंचाने का प्रयास करते हैं। मगर अफसोस इस बात का है कि न सरकार की ओर से साहित्यकारों को किसी भी तरह का प्रोत्साहन मिल रहा है और न ही पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों की ओर से किसी तरह का प्रोत्साहन मिल रहा है, फिर भी साहित्यकार अपना मानवीय धर्म निभा रहे हैं।
कहीं-कहीं समय-समय पर भामाशाहों द्वारा साहित्यकारों को सम्मानित एवं प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है, लेकिन वहां भी गलत आदमी सम्मानित हो जाता है, चूंकि हमारे समाज में एक गलत परम्परा चल रही है और वह यह है कि सम्मानित होना है तो स्वयं आवेदन करें। क्या संपादक मंडल, समाज, भामाशाह व सरकार किसी का भी दायित्व नहीं है कि वे सही साहित्यकार का चयन करें, जो साहित्यकार समाज को एक नई दशा व दिशा देता है? गहन चिंतन-मनन दिन-रात करता है, वह कभी भी सम्मान प्राप्त करने के लिए अपनी तरफ से आवेदन नहीं करेगा। इसका निर्धारण समाज व आयोजकों को ही करना होगा। तभी सही मायने में साहित्यकार को प्रोत्साहन मिल पाएगा।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुंआ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान









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धन्यवाद
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धन्यवाद
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