
भारत में मनाया जाने वाला तीज पर्व प्रकृति के पुनर्जीवन, स्त्री शक्ति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह त्योहार शिव-पार्वती की कथा से जुड़ा होकर प्रेम, तपस्या और पारिवारिक संबंधों की मजबूती का संदेश देता है। देश के विभिन्न राज्यों में तीज की विविध परंपराएँ इसकी सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती हैं।
- तीज: शिव-पार्वती के प्रेम और तपस्या की परंपरा
- मानसून का उत्सव और स्त्री शक्ति का प्रतीक तीज
- भारत के विभिन्न राज्यों में तीज की परंपराएँ
- तीज: संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक समरसता का पर्व
सत्येंद्र कुमार पाठक
भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल तिथियों का समूह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला हैं। जब तपती गर्मी के बाद आसमान में काले बादल घिरते हैं और मरुधरा से लेकर पहाड़ों तक मिट्टी की सोंधी खुशबू महकने लगती है, तब आगमन होता है ‘तीज’ का। तीज का त्योहार मुख्य रूप से मानसून के दौरान श्रावण और भाद्रपद मास में मनाया जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के पुनर्जीवन, स्त्री शक्ति के संकल्प और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है।
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शिव-शक्ति का अटूट बंधन – तीज के मूल में भगवान शिव और माता पार्वती की पौराणिक कथा निहित है। माना जाता है कि माता सती के आत्मदाह के बाद शिव समाधि में चले गए थे। सती ने पुनर्जन्म लेकर पार्वती के रूप में 108 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने अन्न, जल और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। अंततः भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन शिव ने उनकी निष्ठा को स्वीकार किया और उन्हें पत्नी रूप में अपनाया। इसीलिए, यह पर्व ‘अखंड सौभाग्य’ और ‘मनवांछित वर’ की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है।
भारतीय पंचांग के अनुसार तीन मुख्य तीज मनाई जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है:
हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया): यह सावन की हरियाली और उमंग का उत्सव है। इस दिन महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियाँ पहनती हैं, जो प्रकृति के साथ एकाकार होने का प्रतीक है।
कजरी तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया): इसे ‘बूढ़ी तीज’ या ‘सातुड़ी तीज’ भी कहते हैं। इसमें नीम की पूजा का विशेष महत्व है और कजरी लोकगीत गाए जाते हैं।
हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया): यह सबसे कठिन व्रत माना जाता है। इसमें महिलाएं निर्जला व्रत रखकर बालू के शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
भारत के विभिन्न राज्यों में तीज
भारतीय उपमहाद्वीप के हर कोने में तीज का अपना रंग है। आइए, भारत के विभिन्न राज्यों की तीज परंपराओं की सैर करें:
राजस्थान — राजसी वैभव और ‘लहरिया’: राजस्थान में तीज का रूप सबसे भव्य होता है। जयपुर की ‘तीज माता की सवारी’ दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ महिलाएं ‘लहरिया’ साड़ी पहनती हैं। नवविवाहिताओं के लिए उनके मायके से ‘सिंजारा’ आता है, जिसमें श्रृंगार सामग्री और घेवर होते हैं। झूला झूलना और लोकगीत गाना यहाँ की परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
बिहार और झारखंड — संकल्प की पराकाष्ठा: ‘हरतालिका तीज’ का वर्चस्व है। बिहार की महिलाएं इस व्रत को अत्यंत कठोरता से निभाती हैं। घर-घर में मिट्टी के शिव-पार्वती बनाए जाते हैं। यहाँ का ‘पिड़ुकिया’ (गुजिया) और ‘ठेकुआ’ त्योहार की मिठास बढ़ा देते हैं। रात भर जागकर महिलाएं सखियों के साथ लोकगीत गाती हैं, जिसे ‘जागरण’ कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश — कजरी और नीमड़ी माता की पूजा: पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘कजरी’ की गूँज चारों ओर सुनाई देती है। मिर्जापुर और वाराणसी कजरी के केंद्र हैं। यहाँ महिलाएं नीम के पेड़ की पूजा करती हैं, जिसे ‘नीमड़ी माता’ कहा जाता है। सत्तू का भोग लगाना और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देना यहाँ की मुख्य विशेषता है।
मध्य प्रदेश और दिल्ली — आधुनिकता और परंपरा का संगम: मध्य प्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड अंचल में हरतालिका तीज बड़े उत्साह से मनाई जाती है। वहीं दिल्ली जैसे महानगरों में ‘तीज मेलों’ का आयोजन होता है, जहाँ पारंपरिक खान-पान और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी लगती है।
महाराष्ट्र और गुजरात — मंगला गौरी और नृत्य: महाराष्ट्र में श्रावण के मंगलवार को ‘मंगला गौरी’ पूजा होती है। यह तीज का ही एक रूप है, जहाँ महिलाएं ‘झिम्मा’ और ‘फुगड़ी’ जैसे पारंपरिक खेल खेलती हैं। गुजरात में इस दौरान गरबा और डांडिया की खनक सुनाई देती है।
दक्षिण भारत — स्वर्ण गौरी और आदि पूरम: कर्नाटक में इसे ‘गौरी हब्बा’ कहा जाता है। गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले माँ गौरी का स्वागत किया जाता है। तमिलनाडु में ‘आदि पूरम’ मनाया जाता है, जहाँ मंदिरों में देवी को हजारों चूड़ियाँ चढ़ाई जाती हैं और बाद में उन्हें सुहागिन महिलाओं में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
ओडिशा और उत्तराखंड — प्रकृति और परंपरा का सम्मान: ओडिशा में ‘सावित्री व्रत’ के रूप में इसे मनाया जाता है, जबकि उत्तराखंड के पहाड़ों में ‘हरियाला’ पर्व के साथ इसका मेल होता है। यहाँ महिलाएं अपने पारंपरिक ‘पिछौड़ा’ पहनकर पूजा करती हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का जरिया है। विवाहित महिलाएं तीज पर मायके आती हैं, जिससे पारिवारिक संबंधों में मधुरता बढ़ती है। ससुराल और मायके के बीच उपहारों (सिंधारा) का आदान-प्रदान रिश्तों में नई ऊर्जा भरता है। तीज के दौरान महिलाएं घर के कामकाज से अवकाश लेकर अपनी सखियों के साथ समय बिताती हैं। सामूहिक रूप से झूला झूलना, मेहंदी लगाना और नृत्य करना उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव के लिए महत्वपूर्ण है। मेहंदी के जटिल डिजाइन, लोकगीतों की अनूठी धुनें और पारंपरिक परिधान (जैसे लहरिया, बनारसी साड़ी, पिछौड़ा) भारतीय कला और संस्कृति को जीवित रखते हैं।
तीज के पकवान
तीज के पकवानों के बिना यह पर्व अधूरा है। हर राज्य का अपना विशेष स्वाद है—राजस्थान का घेवर, उत्तर प्रदेश और बिहार का सत्तू और मालपुआ, महाराष्ट्र की पुरण पोली तथा झारखंड और बिहार का पारंपरिक प्रसाद ठेकुआ।
प्रकृति से जुड़ा संदेश
तीज हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है। झूलों के लिए पेड़ों का चयन, पूजा में मिट्टी और फूलों का उपयोग और हरियाली की पूजा यह संदेश देती है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति से ही है। यह पर्व ‘इको-फ्रेंडली’ उत्सव का प्राचीन भारतीय उदाहरण है।
शाश्वत परंपरा का जीवंत रूप
आज के आधुनिक युग में भी तीज की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। भले ही उत्सव मनाने के तरीके बदल गए हों, लेकिन इसके पीछे की भावना—प्रेम, श्रद्धा और प्रकृति का सम्मान—आज भी वही है। तीज वह धागा है जो भारत के विभिन्न राज्यों को एक ही सांस्कृतिक माला में पिरोता है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन में कठिन तप (व्रत) के बाद ही मधुर फल (मिलन और खुशहाली) की प्राप्ति होती है। जब तक सावन में घटाएँ घिरेंगी, जब तक पेड़ों पर झूले पड़ेंगे और जब तक मेहंदी की खुशबू महकेगी, तीज की यह गौरवशाली परंपरा भारतीय हृदय की धड़कन बनी रहेगी।








