
कविता बुरे समय में रिश्तों की वास्तविकता और आत्ममंथन की प्रक्रिया को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है। यह रचना बताती है कि सवाल करना हार नहीं, बल्कि आत्मचेतना और आंतरिक शक्ति का प्रमाण है।
- बुरे वक्त की पहचान: भीड़ में अपना कौन
- हार नहीं, आत्मा का ठहराव
- जब सवाल करना ही सबसे बड़ी ताकत बन जाए
- अकेलेपन में जन्म लेती आत्मपहचान
डॉ. प्रियंका सौरभ
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बुरा वक़्त अकेला नहीं आता,
वह अपने साथ बहुत कुछ समेट ले जाता है।
छीनता है रिश्तों का शोर,
सहारे का भ्रम,
और जाते-जाते
एक सवाल छोड़ जाता है—
कि इस भीड़ में
वास्तव में मेरा है कौन?
ऐसे समय
दिन तो मुस्कान की औपचारिकता में कट जाते हैं,
पर रात…
रात घने अँधेरे में
आसमाँ की ओर ताकते हुए
मन से सवाल करती है—
क्या मैं सच में हार गया हूँ?
पर नहीं,
यह हार नहीं होती।
यह ठहराव होता है,
आत्मा की परीक्षा,
जहाँ इंसान
दूसरों को नहीं,
खुद को पहचानता है।
जो सवाल पूछ रहा है,
वह हारा हुआ नहीं है।
हारा हुआ तो वह होता है
जो सवाल करना ही छोड़ दे।
-प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)









