
उत्तराखंड में किसानों की आय बढ़ाने और पलायन पर रोक लगाने के उद्देश्य से सरकार कीवी नीति और ड्रैगन फ्रूट योजना को इस वर्ष से लागू करने जा रही है। इन योजनाओं के तहत भारी सब्सिडी और तकनीकी सहायता से बंजर भूमि को भी लाभकारी बनाया जाएगा।
- कीवी नीति और ड्रैगन फ्रूट योजना इस वर्ष से धरातल पर
- किसानों को 70 से 80 प्रतिशत तक मिलेगी सरकारी सब्सिडी
- नकदी फसलों से पलायन रोकने की तैयारी
- विदेशी फलों से मजबूत होगी उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड अब केवल पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विदेशी प्रजाति के फलों की खेती के लिए भी पहचान बनाएगी। किसानों की आय में वृद्धि और गांवों से हो रहे पलायन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने कीवी नीति और ड्रैगन फ्रूट योजना को इस वर्ष से प्रभावी रूप से धरातल पर उतारने की तैयारी कर ली है। इसके लिए उद्यान विभाग ने किसानों के चयन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।
राज्य की कृषि व्यवस्था बीते वर्षों में कई चुनौतियों से जूझती रही है। मौसम की अनिश्चितता, जंगली जानवरों से फसल नुकसान, लागत बढ़ना और रोजगार की कमी के चलते बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने परंपरागत खेती के स्थान पर नकदी फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।
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कीवी: पहाड़ के लिए भविष्य की खेती
उत्तराखंड की जलवायु को कीवी उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल माना गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कीवी को भविष्य की खेती घोषित किया है। कीवी नीति के तहत प्रति एकड़ 12 लाख रुपये की लागत पर 70 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाएगी। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 3500 हेक्टेयर क्षेत्र में कीवी की खेती विकसित करने का है, जिससे 17,500 से अधिक किसान लाभान्वित होंगे।
हरिद्वार और उधमसिंह नगर को छोड़कर राज्य के शेष 11 जिलों में मिशन मोड में इस योजना को लागू किया जाएगा। इसके लिए लगभग 894 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार की गई है। वर्तमान में राज्य में 683 हेक्टेयर क्षेत्र में 382 मीट्रिक टन कीवी का उत्पादन हो रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य है।
ड्रैगन फ्रूट: बंजर भूमि से होगी कमाई
ड्रैगन फ्रूट की खेती उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जा रही है, जहां पानी की कमी है या वन्यजीवों का खतरा अधिक रहता है। इस योजना के तहत प्रति एकड़ 8 लाख रुपये की लागत पर 80 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाएगा, जबकि शेष 20 प्रतिशत किसान को स्वयं वहन करना होगा। यह फसल कम मेहनत में अधिक मुनाफा देने वाली मानी जाती है। देहरादून, टिहरी, पौड़ी, नैनीताल, बागेश्वर, हरिद्वार और उधमसिंह नगर जिलों में ड्रैगन फ्रूट को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है। वर्तमान में राज्य में 35 एकड़ क्षेत्र में 70 मीट्रिक टन ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन हो रहा है।
योजनाओं से होंगे बहुआयामी लाभ
इन नकदी फसलों से मिलने वाली उच्च आय से युवाओं को गांवों में ही रोजगार मिलेगा, जिससे पलायन पर रोक लगेगी। सरकार द्वारा ई-रूपी वाउचर प्रणाली के माध्यम से खाद, बीज और सब्सिडी की राशि सीधे किसानों के मोबाइल पर भेजी जा रही है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी। कृषि एवं उद्यान सचिव डॉ. एस.एन. पांडेय के अनुसार, कीवी और ड्रैगन फ्रूट की बाजार में अच्छी मांग है, भंडारण क्षमता बेहतर है और उत्तराखंड का वातावरण इनके स्वाद व गुणवत्ता को और निखार देता है। ये योजनाएं राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर साबित होंगी।





