सद् साहित्य समय की आवश्यकता : माथुर

सद् साहित्य समय की आवश्यकता : माथुर… श्रेष्ठ साहित्य सृजन के लिए रचनाकार श्रेष्ठ चिंतन मनन करें। घटना स्थल पर जाकर वस्तु स्थिति का अवलोकन करे और फिर जैसा देखा है वैसा ही लेखन करे और आम बोलचाल की भाषा में लेखन कार्य करे। आज साहित्य सृजन के नाम पर पुरानी पत्र पत्रिकाओं से सामग्री चुराकर लेखन कार्य हो रहा है जो उचित नहीं है।
आज देश में जो हालात बनें हुए हैं वह देश को कहां ले जायेगा। यह एक चिंता की बात हैं। केवल कठोर कानून बना देने से काम चलने वाला नहीं है अपितु समाज में अमन-चैन, शान्ति, सद् भाव व खुशहाली के लिए इंसान को अपने विचारों में भी परिवर्तन लाना होगा। समाचार और साहित्य को लेकर जोधपुर के साहित्यकार सुनील कुमार माथुर से हमारे विशेष संवाददाता ध्दारा लिया गया साक्षात्कार यहां प्रस्तुत है-
सवाल : आज समाचार पत्रों-पत्रिकाओं, व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर जो समाचार व साहित्य सृजन हो रहा हैं वह आपकी निगाहों में कितना सही हैं ?
माथुर : आज जो समाचार व साहित्य उपरोक्त माध्यम से जनता-जनार्दन तक पहुंच रहे हैं उनमें से अधिकांश समाचार व आलेख आपराधिक जगत से जुडे होते हैं जिन्हें पढने से किसी का भला होने वाला नहीं है। यह मात्र एक सस्ती लोकप्रियता पाने का तरीका है। समाचार व आलेख रचनात्मक होने चाहिए और साथ ही साथ शिक्षाप्रद व प्रेरणादायक भी होने चाहिए ताकि जनता-जनार्दन में आदर्श संस्कार बने रहें। आपराधिक समाचारों व आलेखों को पढने के बाद इंसान जो अब तक शान्त बैठा था वह भी अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है जो सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है।
सवाल : आप साहित्य सृजन से जुड़े हुए हैं, इसलिए यह बताइये कि आनलाईन साहित्य सृजन अच्छा हो रहा है या फिर प्रिंट मीडिया में अच्छा साहित्य सृजन हो रहा हैं ?
माथुर : प्रिंट मीडिया में जो साहित्य सृजन पहले होता था वह श्रेष्ठ साहित्य सृजन होता था जिसके प्रकाशित होने के बाद वह उत्कृष्ट व विश्वसनीय दस्तावेज के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था लेकिन आज साहित्य सृजन में गिरावट आने से वह पहले जैसी बात नहीं रही।
सवाल : क्या साहित्य सृजन में गिरावट आई है ?
माथुर : हां काफी गिरावट आई है। पहली बात अब सनसनीखेज के नाम पर आपराधिक लेखन ज्यादा हो रहा है जिसमें चिंतन मनन नहीं होता है। वहीं भाषा की शुध्दि का भी ध्यान नहीं रखा जाता है केवल येन केन प्रकारेण नाम छपते रहने की चाह रचनाकार को बनी रहती है। चूंकि आज छपास के रोगी भी काफी पनप गये है, वही फूहड़ता पाठकों को साहित्य के नाम पर परोसी जा रही है।
सवाल : इससे पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन पर क्या असर पडा ?
माथुर : श्रेष्ठ साहित्य सृजन के अभाव के कारण अनेक पत्र पत्रिकाओं का या तो प्रकाशन बंद हो गया है या फिर वे बंद होने के कगार पर है या मात्र उनकी आफिस कापियां ही फाइल बनाने के लिए छप रही हैं।
सवाल : श्रेष्ठ साहित्य सृजन में कितनी गिरावट आई है और किस स्तर तक ?
माथुर : श्रेष्ठ साहित्य सृजन के लिए रचनाकार श्रेष्ठ चिंतन मनन करें। घटना स्थल पर जाकर वस्तु स्थिति का अवलोकन करे और फिर जैसा देखा है वैसा ही लेखन करे और आम बोलचाल की भाषा में लेखन कार्य करे। आज साहित्य सृजन के नाम पर पुरानी पत्र पत्रिकाओं से सामग्री चुराकर लेखन कार्य हो रहा है जो उचित नहीं है। चूंकि समय के साथ ही साथ वहां की स्थिति भी बदल जाती है। या तो वे देखरेख के अभाव में खंडर हो जाते है या फिर उनका जीर्णोद्धार हो जाता हैं। अतः साहित्य सृजन चुरा कर नहीं अपितु वस्तु स्थिति के अनुसार ही लिखें। तभी हम साहित्य सृजन की गरिमा को बचा पायेगे। वहीं दूसरी ओर सम्पादक मंडल व प्रकाशक को भी चाहिए कि वे सनसनीखेज के नाम गलत जानकारी प्रकाशित न करें और न ही उल जलूल बातें।
सवाल : श्रेष्ठ साहित्य सृजन के भविष्य के बारे में आप का क्या ख्याल है ?
माथुर : अगर यही स्थिति रही तो पौधारोपण की तरह नये नये रचनाकार पनपते रहेंगे व सही मार्गदर्शन के अभाव में साहित्य सृजन का असलीपन खत्म हो जायेगा व आलेख काल्पनिक आलेख बन कर रह जायेंगे।
सवाल : वर्तमान समय में साहित्य सृजन कैसा लग रहा हैं ?
माथुर : वर्तमान समय में श्रेष्ठ साहित्य सृजन की बात समय की बर्बादी लग रही हैं। चूंकि साहित्यिक सामग्री पढने के बाद न तो कमेंट्स करने वाले पाठक अब रहे है और न ही पढने वाले पाठक। अब तो हर कोई फेसबुक पर छाये रहना चाहता है जो दिन भर अपनी रचनाओं पर लाईक व कमेंट्स देख देख कर खुश हो रहा है।