लघुकथा : शरीफ आदमी

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लघुकथा : शरीफ आदमी। इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ जन संगठनों में उनका आना-जाना चलता रहता था और इसी दरम्यान वह पैंतालीस की उम्र भी पार कर गये। पढ़ें बिहार से राजीव कुमार झा की कलम से…

सुभाष का बचपन पटना में व्यतीत हुआ और उसके पिता यहां यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ाते थे, उनका शहर में काफी आदर सम्मान था, वे परंपरागत विचारों के अलावा आधुनिक जीवन संस्कृति की अच्छी बातों का भी आदर करते थे। पटना में बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुभाष का एडमिशन दिल्ली की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी में हो गया और यहां सामाजिक-राजनीतिक विचारों के कुछ छात्रों से मेल मुलाकात के बाद सुभाष ने अविवाहित रहकर समाज के लिए कुछ रचनात्मक कार्यों में जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया और एक कालेज में पढ़ाने लगे ।

इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ जन संगठनों में उनका आना-जाना चलता रहता था और इसी दरम्यान वह पैंतालीस की उम्र भी पार कर गये। शादी विवाह की उम्र बीत गयी और उन दिनों जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में काफी दंगे हो रहे थे और सुभाष कुछ दोस्तों के साथ दंगाइयों के हाथों निर्दोष लोगों को बचाने में जुटे थे तो यहां निष्ठा से उनकी मुलाकात हुई और वे दोनों दोस्त बन गये और फिर आपस में प्रेम भी करने लगे।

निष्ठा सुभाष से बीस साल छोटी उम्र की लड़की थी और कोलकाता से काफी साल पहले वह भी पढ़ाई-लिखाई करने दिल्ली आयी थी लेकिन सुभाष के कालेज की नौकरी की वजह से उसका उसके प्रति आकर्षण कायम हुआ और निष्ठा ने सुभाष से शादी करने का फैसला किया। विवाह के बाद निष्ठा सुभाष के साथ पन्द्रह-बीस सालों तक अच्छे ढंग से रही लेकिन इस बीच सुभाष वृद्ध हो गये और निष्ठा के दांपत्य जीवन में सेक्स का सुख खत्म हो गया।

वह परेशान रहने लगी। उसका बेटा भी जर्मनी में पढ़ाई पूरी करने के बाद वहां नौकरी करने लगा था और यहां आने के बाद वापस चला गया था। इन्हीं परिस्थितियों में हेमंत नाम के शादीशुदा युवक से निष्ठा के दैहिक संबंध कायम हो गये और सुभाष की अनुपस्थिति में वह उसे अपने फ्लैट पर बुलाने लगी थी। दिल्ली में यह सब अब आम बातें हो गयी हैं और सुभाष को अपनी गैरहाजिरी में निष्ठा के दोस्तों के घर पर आने की जानकारी अपने शुभचिंतकों से मिली थी, लेकिन वह संकोचवश खुद को उसे कुछ कहने की स्थिति में नहीं पा रहा था।

हेमंत के अलावा और भी लोगों ने निष्ठा से दोस्ती गांठ ली थी और वे उसके घर पर दोपहर में आने लगे थे । ऐसे ही किसी दिन निष्ठा को कालेज से अचानक वापस आने के बाद उसे घर में अकेले देखा था, वे दोनों ड्राइंग रूम में बैठकर बातें कर रहे थे और सुभाष के आने के बाद हेमंत वहां से चला गया था।

यह फ्लैट सुभाष ने पटना में अपने घर के अपने हिस्से को छोटे भाई के हाथों बेचकर कुछ साल पहले निष्ठा के नाम से खरीदा था लेकिन आज यह घर उन्हें पराया सा लगा और वे अपना सामान यहां समेटने में जुट गये और शाम तक किसी प्रोपर्टी डीलर के मार्फत नये फ्लैट को ढूंढ कर किरायेदार के रूप में उसमें अकेले रहने के लिए चले गये थे।

कविता : डॉ. अंबेडकर का मिशन


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लघुकथा : शरीफ आदमी। इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ जन संगठनों में उनका आना-जाना चलता रहता था और इसी दरम्यान वह पैंतालीस की उम्र भी पार कर गये। पढ़ें बिहार से राजीव कुमार झा की कलम से...

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