आस्था और उमंगो को व्यक्त करता आया सावन

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आशुतोष

गर्मी के साथ ही बरसात का आगमन और फिर सावन में कांवरियों की भीड़ गेरूआ रंग-मानो सभी एक ही रंग में रमाये हो । इसमे कोई भिन्नता नही दिखती जैसे प्रकृति एक समान रंगीन हो जाती है ठीक वैसे ही सभी बाबा भोलेनाथ के रंग में रंग जाते हैं ।हमारे देश का मौसम चक्र ही कुछ ऐसा है जहाँ हर मौसम की अपनी विशेषता है।

सावन उनमें खास है। सावन की सुष्क हवा में वो मीठा एहसास है। हरी भरी बगीचा सुन्दर फूल हरे भरे खेत और मस्त पवन का झोंका मानो एक पल में लेकर उड़ना चाह रही हो।क्या बच्चे क्या बूढ़े सभी लग जाते इस सावन मेले में और प्रकृति के इस अदभूत नजारो का लुफ्त लेते है कोई गाकर कोई बजाकर कोई सजकर कोई नाचकर वेहद अदभूत और अविस्मरणीय बन जाते हैं जब कांवर ले बोल बम के ध्वनि के साथ चलते हैं।

जहाँ तक सावन का सवाल है तो यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है।भक्तण भगवान और जुडा यह महीना आस्था के साथ साथ प्रकृति प्रेम को भी उसी तरह दर्शाता है। इस महीने में लोग सादगी में रहते है । बिहार में यह महीना कुछ खास होती है। इस महीने में ज्यादातर घरो में मांस मछली लहषन प्याज का सेवन प्रायः सभी घरो मे बंद रहता है। शहर की होली उतनी खास नही होती क्योंकि यहाँ की होली एक परिवार या एक रूम, फ्लैट में सिमट कर दम तोड़ने लगी है कुछ लोग ही ऐसे है जो घर से निकलकर होली खेलते जिनमें केवल युवा ही ज्यादा होते हैं।

पौराणिक परम्पराओं और आपसी सौहार्द साथ हमारी एकता और अखण्डता के लिए यह एक शानदार महीना माना गया है । बारिस अपने शबाब पर होता है हवा के बीच यह बोल बम का नारा का हम सब को कालान्तर से ही भक्त को भगवान से जोड़ती रही है। बीते कुछ वर्षो मे कोरोना,मँहगाई और बेरोजगारी भी इस महीने के उल्लास को फीका कर दिया है ।खाने पीने पहनने आने जाने सभी की बढती कीमत ने लोगो के आस्था पर भी चोट कर रखा है।

बहुत से लोग दो जून की रोटी के लिए ईधर उधर भटकते हैं ऐसे में सावन कब आया और कब गया पता ही नही चलता। हमारे पारम्परिक तरीके और सादगी को व्यवसायिक बनाया गया।भक्त और भगवान के बीच भी व्यवसायीकरण छा चुका है। सभी जगहों पर मिलावट और दलाली हावी है।खान पान में भी मिलावट का दौर बदस्तूर जारी है जिनसे बचना ही ज्यादा फायदेमंद है। किताबी ज्ञान के चक्कर में आज के युवा वर्ग इस तरह के माहौल को पसंद भी नही करते क्योंकि बहुत से युवाओ ने गाँवो की संस्कृति से परिचित नही होते।

पौराणिक कहानियों के बारे में जानते भी नही क्योंकि उन्हें अपनी संस्कृति के बारे में विस्तृत जानकारी या समय देने का मौका नही मिलता।कई ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे।पहले का दौर था जब लोग दादा- दादी नाना- नानी गाँव के बडे लोगो के बीच बैठकर उनके संपर्क में रहकर हर तरह की कहानीयों व्यवहारिकताओं और उच्च विचारों को सीखते थे।आज वो दौर नही है टीवी और मोवाइल से हम अपनी संस्कृति को कैसे संभालेंगे और सावन की विशेषता को कैसे जीवित रखेंगे यह सोचनीय है।

अतः आज की युवा पीढी को आने वाले समय के लिए और अपनी संस्कृति को समझने के लिए अपने लिए कुछ समय इन सभी विषयों पर भी देना चाहिए जिनसे उनकी आने वाली पीढी भी इसी तरह हर मौसमी महीना का लुफ्त उठाते रहे जिससे हमारी संस्कृति और मजबूत बना रहे।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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आशुतोष, लेखक

पटना, बिहार

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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