राइट टू रिपेयर : एक अनोखे अधिकार की मांग

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

राइट टू रिपेयर यानी कि मरम्मत के काम के अधिकार के लिए मांग विदेशों में शुरू हो गई है। यह इलेक्ट्रॉनिक युग है और इसके कारण ई-कचरा बहुत ज्यादा जमा हो रहा है। कोई भी गैजेट्स बिगड़ता है तो रिपेयर न होने की वजह से वह ई-कचरा में डाल दिया जाता है। इसलिए ई-कचरा एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। छोटी सी खराबी आने पर भी गैजेट्स को फेंक देना पड़ता है। इसीलिए अब विदेशों में राइट टू रिपेयर के अधिकार की मांग हो रही है।

आजकल इलेक्ट्रॉनिक चीजों का उपयोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है। स्मार्ट फोन या उसके साथ उपयोग में आने वाली एसेसरीज भी बढ़ी है। टीवी और कंप्यूटर जैसे उपकरणों का भी उपयोग बढ़ा है। ये तमाम चीजें बिगड़ती हैं तो थे फेंक दी जाती हैं या इन्हें फेंक देना पड़ता है। खास कर विदेशों में तमाम चीजें जरा सी भी खराबी आने के कारण फेंक देनी पड़ती हैं। ऐसे तमाम देश हैं, जहां गैजेट्स को सुधारने की सुविधा नहीं है और है भी तो वह इतनी महंगी होती है कि नया गैजेट्स ले लेना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। इस स्थिति में यूरोपीय देश और अमेरिका में भी तमाम नेता एवं नीति निर्माता मानते हैं कि गैजेट्स की मरम्मत का काम आसानी से हो जाए ऐसी सुविधा होनी चाहिए।

तमाम टिप्पणीकारों का कहना है कि कंपनिया जान बूझकर ऐसा उत्पाद बनाती हैं कि जिसे सुधारना मुश्किल हो अथवा यूजरों के लिए स्पेयरपार्ट्स मिलना मुश्किल हो। इसलिए लोग उस चीज को सुधरवाने के बजाय फेंक देना ज्यादा उचित समझते हैं। स्वाभाविक है कि स्पेयरपार्ट्स न मिलने के कारण छोटेमोटे ही नहीं, बड़े उपकरण भी फेंक देने पड़ते हैं। इस वजह से पिछले साल मार्च में यूरोप के देशों ने वाशिंग मशीन, डिश वाॅशर्स, फ्रिज और टीवी जैसे उपकरण बनाने वाली कंपनियां बंद हो जाएं तो उसके बाद भी दस साल तक स्पेयरपार्ट्स बनाना पड़ेगा, इस तरह का आदेश कंपनियों को दिया है। इस आदेश के पीछे कारण यह है कि तमाम कंपनियां गैजेट्स बनाती हैं। पर धंधा नहीं चलता तो ये कंपनियां गैजेट्स बनाना बंद कर देती हैं। उपकरण बनना बंद होने पर उसमें उपयोग में आने वाले स्पेयरपार्ट्स भी बनना बंद हो जाते हैं। इसलिए जरा भी खराबी आने पर उपकरण को फेंक देना पड़ता है।

इस आदेश के बाद अब सरकारें चाहती हैं कि इस तरह के नियम फोन तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के लिए भी लागू किए जाएं। पिछली जुलाई में अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने राइट टू रिपेयर अधिकार के हक में सर्वसम्मति से मत दिया था। विदेश में सरकारें राइट टू रिपेयर की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में कंपनियों का कहना है कि वे भी ग्राहकों को राइट टू रिपेयर का अधिकार देना चाहती हैं। परंतु हर समय यह संभव नहीं है। उपकरण खराब हो यानी हर बार उसे सुधारा नहीं जा सकता। उपकरण को सुधारना सुरक्षित भी नहीं होता। क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक चीजें बहुत जटिल होती हैं।

एक ओर गैजेट्स को सुधारने का काम न होने के कारण अनेक समस्याएं पैदा हुई हैं। खास कर ई-कचरा बड़ी मात्रा में पैदा हो रहा है। उसे नष्ट करना मुश्किल है और नष्ट भी किया जाए तो प्रदूषण पैदा होता है, जो एक और नई समस्या पैदा करता है। तमाम संपन्न देश अपना कचरा तीसरी दुनिया में ठेल कर पर्यावरण के बचाव से हाथ झटक लेते हैं। ई-कचरा इतना अधिक बढ़ जाता है कि उसका निष्कासन भी एक समस्या है। खैर, ई-कचरे की बात करें तो 2019 में पूरी दुनिया में 5.36 करोड़ टन ई-कचरा पैदा हुआ था।

संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े के अनुसार, इसमें से केवल 17.4 प्रतिशत ई-कचरा रिसाइकल हो सका है। मतलब कि बाकी का कचरा तो पहाड़ बन रहा है। 4 प्रतिशत की दर से हर साल ई-कचरा बढ़ रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि हर साल ई-कचरा की समस्या बढ़ती ही जानी है। ई-कचरा की समस्या के हल के लिए राइट टू रिपेयर का अधिकार महत्वपूर्ण है। स्वाभाविक है कि थोड़े खर्च में उपकरण सुधर जाएगा तो अधिक खर्च कर के लोग नया उपकरण क्यों खरीदेंगें? इसी बात को ध्यान में रख कर राइट टू रिपेयर के कारण ई-कचरा की मात्रा भी घटेगी।

इस साल राइट टू रिपेयर यूरोप नामक संगठन ने वियना शहर के आर्थिक मामलों को देखने वालों के साथ मिल कर एक बाउचर योजना तैयार की है। कोई भी व्यक्ति अपना गैजेट्स खराब होने पर फेंक देने के बजाय उसे रिपेयर करा कर फिर से उपयोग में ले आता है तो सौ यूरो का कूपन उसे प्रोत्साहन मनी के रूप में मिलेगा। इस योजना के अंतर्गत एक दो नहीं, 26 हजार उपकरणों को सुधरवा कर फिर से उपयोग में लेना है। इस योजना से ई-कचरा 3.75 प्रतिशत घटा है। इस योजना को सफल होते देख अमेरिका भो इस तरह की योजना से लोगों के उपकरणों को सुधरवा कर उसे उपयोग में लाने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

दुनिया में अगर कम खर्च पर इलेक्ट्रॉनिक और अन्य उपकरण सूधारे जा सकें तो उन्हें फेंक देने के बजाय और अधिक सालों तक उन्हें उपयोग में लाया जा सकेगा, जिससे ई-कचरा की समस्या थोड़ी कम होगी।महानगरों में घरेलू कचरे के साथ रिसाइकल न हो सके, इस तरह का कचरा भी बढ़ रहा है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में ऐसे तमाम उपकरण होते हैं, जो रिपेयर हो सकते हैं। अगर उन्हें सुधार कर उपयोग में लाया जाए तो ई-कचरा घटाने में मदद की जा सकती है। ऐसे में राइट टू रिपेयर का नारा कितना बुलंद होगा, यह देखना है।

¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

लेखक एवं कवि

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जेड-436-ए, सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उत्तर प्रदेश) मो: 8368681336

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

 

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