कविता : एहसास

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कविता नन्दिनी 

मोबाइल का नया जमाना
क्या समझे एहसास पुराना
रिश्ते नाते सभी हैं बदले
छूटा मिलना और मिलाना।।

नई सोच है नई दिशाएँ
सब संग है पर किसे निभाएँ
कल वाले ही रहे आज हम
सबकी लेते रहे बलाएँ।।

कैसे उनको हम समझाएँ
वापस उनको लेकर आएँ
ख़ुद ही कितना सिमट गए है
शायद यह भी समझ न पाएँ।।

वे मस्ती के दिन होते थे
मिल कर साथ सभी रहते थे
आदर और सम्मान था सब का
सुख-दुख सब मिल कर सहते थे ।।

एक दूसरे से कट कर अब
जीने लगे आज के लोग
सीमित साधन सीमित पैसा
सीमित रिश्तो में है लोग।।

होड़ लगी आगे जाएँ हम
सबको छोड़ निकल जाएँ हम
सब कुछ पा जाने की ख़ातिर
अपनों को भी भरमाएँ हम।।

कैसे ये एहसास खो गए
मोबाइल जब पास हो गए
बदल रही दुनिया रिश्तों की
जीवन में संत्रास बो गए।।

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¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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कविता नन्दिनी

कवयित्री

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सिविल लाइन, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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