
देहरादून में संयुक्त निदेशक के एस चौहान ने अपनी पुस्तक “पहलगाम… जब समय थम गया” पुष्कर सिंह धामी को भेंट की। यह पुस्तक पहलगाम में हुए आतंकी हमले के दौरान उनके निजी अनुभवों पर आधारित है। मुख्यमंत्री ने घटना को याद करते हुए शहीद पर्यटकों को श्रद्धांजलि दी और सुरक्षा कार्रवाई की सराहना की।
- पहलगाम हमले की पहली बरसी पर आई अनुभवों की पुस्तक
- केएस चौहान ने सीएम धामी को सौंपी अपनी किताब
- आतंकी हमले की दास्तान बनी “पहलगाम… जब समय थम गया”
- व्यक्तिगत अनुभवों से उभरी पहलगाम त्रासदी की कहानी
देहरादून | देहरादून में 22 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और भावनात्मक पहल के तहत सूचना एवं लोकसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक के एस चौहान द्वारा लिखित पुस्तक “पहलगाम… जब समय थम गया” सार्वजनिक रूप से सामने आई। यह पुस्तक पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले की पहली बरसी पर जारी की गई, जिससे यह और अधिक संवेदनात्मक महत्व रखती है।
यह पुस्तक लेखक के निजी अनुभवों पर आधारित है, क्योंकि घटना के समय वे अपने परिवार के साथ पहलगाम में ही मौजूद थे। पुस्तक में उस भयावह दिन के हालात, घटनाओं की श्रृंखला, पर्यटकों की स्थिति और स्थानीय माहौल का विस्तृत और संवेदनशील चित्रण किया गया है। लेखक ने अपने अनुभवों के माध्यम से उस त्रासदी को शब्दों में ढालने का प्रयास किया है, जो पाठकों को उस समय की परिस्थितियों का प्रत्यक्ष एहसास कराती है।
बुधवार को के एस चौहान ने पुष्कर सिंह धामी से भेंट कर अपनी पुस्तक की प्रति उन्हें भेंट की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के व्यक्तिगत अनुभव समाज को घटनाओं की गहराई समझने में मदद करते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि एक वर्ष पूर्व पहलगाम में हुआ आतंकी हमला देश के लिए अत्यंत दुखद और झकझोर देने वाली घटना थी। उन्होंने हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष पर्यटकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की।
उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के माध्यम से आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश दिया, जो वैश्विक स्तर पर देश की शक्ति और संकल्प का प्रतीक बना। पुस्तक के अंतिम हिस्से में “ऑपरेशन सिंदूर” का उल्लेख करते हुए उस कार्रवाई के प्रभाव और महत्व को भी दर्शाया गया है। यह पुस्तक न केवल एक व्यक्तिगत अनुभव है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ समाज की संवेदनाओं और राष्ट्रीय एकता का भी प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है।
“पहलगाम… जब समय थम गया” एक ऐसी कृति के रूप में सामने आई है, जो पाठकों को न केवल घटना की जानकारी देती है, बल्कि उन्हें उस दर्द और भय का अनुभव भी कराती है, जिसे प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया गया था।





