- मोबाइल की लत से समाज के उत्थान तक, जीवन को दिशा देने वाले विचार
- कलम, आचरण और अनुभव: जीवन की सफलता के अनमोल सूत्र
- अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जरूरी, समाज को बेहतर बनाने का संदेश
- जीवन में कितना चले से अधिक जरूरी है सही दिशा में चलना
सुनील कुमार माथुर
देश भले ही आजाद हो गया है, लेकिन इंसान की मानसिकता अभी भी नहीं बदली है। पहले लोग आदमी के लिए कहा करते थे कि यह अपनी बीवी का गुलाम है, लेकिन अब वह फोन का गुलाम बन गया है। फोन जब वायर से बंधा था, तो इंसान आजाद था, लेकिन जब से फोन आजाद हुआ है, इंसान फोन से बंध गया है। एक छोटे से डिब्बे में न जाने कितनी जानकारी भरी पड़ी है कि इंसान नींद में से उठते ही पहले इसे देखता है, जबकि पहले माता-पिता को प्रणाम करना चाहिए। ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। लेकिन यह सब आज गौण हो गया है। बस मोबाइल। मोबाइल। मोबाइल। यहां तक कि यह सारे रिश्ते भी खा गया। मोबाइल पर इतने लट्टू हो गए हैं कि अपनों से भी फोन हर वक्त हाथ में होने के बावजूद बातचीत नहीं करते हैं। यह कैसी विडंबना है?
कलम भी क्या चीज है
कलम भी क्या अजीब चीज है, खुद को खाली करके किसी के जज्बातों को भरती है। कलम जब भी चलती है, तब वह धड़ाधड़ चलती है और रुकने का नाम भी नहीं लेती है। साहित्यकारों, पत्रकारों और विद्यार्थियों को कलम की सबसे अधिक जरूरत पड़ती है। इनके लिए यह मां सरस्वती का वरदान है, जो हर रोज नए-नए शब्दों को पिरोते हुए सुंदर-सुंदर रचनाओं को आकार देने का कार्य करती है। यह जब चलती है, तो चलती ही रहती है, जब तक कलम की स्याही समाप्त न हो जाए। अपने भीतर की स्याही का त्याग कर वह जन-जन को गहरा ज्ञान करा देती है। कलम चाहे सोने की हो या लकड़ी की, सदैव जनहित में ही चलनी चाहिए। कलम का दुरुपयोग करना मां सरस्वती का अपमान करना ही समझा जा सकता है। अतः कलम की गरिमा को बनाए रखना हम सबका दायित्व है।
आचरण
आदमी उच्चारण से नहीं, उच्च आचरण से श्रेष्ठ बनता है। अतः व्यक्ति को अपना आचरण बनाए रखना चाहिए। जब आपका आचरण श्रेष्ठ होगा, तभी आपकी समाज में इज्जत, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा होगी। आचरण शब्द भले ही दिखने में बहुत ही छोटा-सा है, लेकिन यह आदर्श संस्कारों की नींव है। हमें सभी के हितों का ध्यान रखना चाहिए। केवल हर वक्त अपने ही बारे में नहीं सोचना चाहिए। अपने व अपने परिवारजनों के लिए तो हर कोई सोचता है व श्रेष्ठ ही करता है, लेकिन जो दूसरों का भी ख्याल रखता है, वही श्रेष्ठ कहलाता है। अतः जीवन में व्यवहारिक बनें, न कि व्यवसायिक बनें।
शर्तें और तजुर्बे
जिंदगी की हर सुबह कुछ शर्तें लेकर आती है और जिंदगी की हर शाम कुछ तजुर्बे देकर जाती है। उक्त कथन बहुत ही प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद है। जीवन में हर रोज कुछ-न-कुछ नया सीखते रहना चाहिए। सीखना कोई बुरी बात नहीं है। यह हमें तजुर्बे ही देता है। इसलिए हर चीज को या कार्यों को शर्तों से नहीं नापा जाना चाहिए, अपितु तजुर्बे का भी अपना महत्त्व है। आप किसी दिन सुबह से शाम तक किसी अनुभवी व्यक्ति या बुजुर्ग व्यक्ति के पास बैठकर चर्चा कीजिए और शाम को फिर एकांत में बैठकर सोचिए कि आज आपने कितना तजुर्बा मात्र एक चर्चा के दौरान हासिल किया। शायद इतना ज्ञान आप पुस्तक पढ़कर भी आसानी से हासिल नहीं कर सकते थे। अतः जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनुभवी लोगों का साथ अवश्य कीजिए और अपने ज्ञान को हर रोज अपडेट करते रहिए।
समाज का उत्थान
समाज उत्थान की बात आज हर कोई करता है, लेकिन आगे कदम कोई-कोई व्यक्ति ही बढ़ाता है। समाज उत्थान की बातें समाचार पत्रों में सुर्खियां बनने तक ही सीमित रह गई हैं। तभी तो हर कोई अपने अधिकारों की ही बात कर रहा है। यहां तक कि वह अपने अधिकारों की मांग करते हुए आंदोलन तक कर रहे हैं, लेकिन अपने कर्तव्यों को निभाने की बात कोई नहीं कर रहा है। नतीजतन आज देश नाना प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। विकास के नाम पर आवंटित धनराशि की बंदरबांट हो रही है। जनहित के कार्यों में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है। आवाज उठाने वालों को डराया-धमकाया जा रहा है। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हर कोई नहा रहा है, फिर भला समाज का उत्थान खाक होगा? विकास व समाज उत्थान के लिए ईमानदारी, कार्य के प्रति लगन व निष्ठा का होना नितांत आवश्यक है। जब तक हम अपने धर्म को अपना कर्तव्य नहीं मान लें, तब तक समाज का उत्थान संभव नहीं है।
जीवन में महत्त्वपूर्ण क्या है?
जीवन में क्या चीज महत्त्वपूर्ण है, इस बात का अंदाजा परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। चूंकि हर चीज का अपना महत्त्व होता है और उसे जरूरत के अनुसार ही इस्तेमाल किया जाता है। कोई सामग्री एक व्यक्ति के लिए बेकार हो सकती है, वहीं दूसरे के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। बस यही अंतर हमें यह सीख देता है कि व्यक्ति को हर वक्त नया सीखते रहना चाहिए और दूसरों से हटकर कुछ नया कर दिखाना चाहिए। तभी आपके हुनर को सलाम है। कहा भी जाता है कि घड़ी से ज्यादा कंपास (दिशा सूचक) की कीमत होती है, क्योंकि जीवन में कितना चले, इससे ज्यादा किस दिशा में चले, यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान।
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