- महँगाई में दीपावली कैसे मनाएँ?
- हे लक्ष्मी माँ! गरीब की पुकार सुनो
- महँगाई, भ्रष्टाचार और आम आदमी की बेबसी
- बाजार की लूट पर व्यंग्य
सुनील कुमार माथुर
हे लक्ष्मी माँ! इस भीषण महँगाई के दौर में मैं कैसे दीप जलाऊँ? देश की जनता न केवल महँगाई की मार से परेशान है, अपितु चारों ओर शिक्षित बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, बेईमानी, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार, मिलावट, रिश्वतखोरी का माहौल है। हमारी सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि सभी नकारा साबित हो रहे हैं। जनता-जनार्दन की कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही है। हर कोई बेईमानी का खेल खेल रहा है।
हे लक्ष्मी माँ! चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मकान जैसी मूलभूत सुविधाएँ जनता-जनार्दन की सेवा के नाम पर व्यापार बन गई हैं। यहाँ जनता को जिस तरह से लूटा जाता है, उसे देखकर लगता है कि इंसान को किस तरह नींबू की तरह निचोड़ा जा रहा है। शहर भर की सड़कें टूटी पड़ी हैं। यातायात व्यवस्था चरमरा गई है। सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता है। पानी, बिजली व आवास जैसी सुविधाएँ भी जनता को ठीक से नहीं मिल रही हैं।
खाद्यान्न सामग्री में मिलावट का गोरखधंधा चल रहा है। मिठाई, मेवों, सब्जियों व तमाम तरह की खाद्य सामग्री में स्वाद नाम की कोई चीज नहीं रही है। महँगे दामों में व्यापारी वर्ग माल बेच रहे हैं। एक बार किसी वस्तु के दाम बढ़ गए तो फिर कम होने का नाम नहीं है। हर वस्तु सोने-चाँदी की तरह ऊँचे दामों पर बिक रही है। कहीं भी नियंत्रण नहीं है। हे लक्ष्मी माँ! अब आप ही बताइए कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार पैसा कहाँ से लाएँ। आप तो धन की देवी हैं और यह बात अच्छी तरह से जानती हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं। कड़ी मेहनत से कमाया जाता है और खून-पसीना एक करना पड़ता है, जब जाकर 30 दिन बाद वेतन मिलता है और वह भी इस तरह से बढ़ती महँगाई के बीच ऊँट के मुँह में जीरे के समान है।
हे लक्ष्मी माँ! आप तो धन-दौलत के बीच पली और बड़ी हुई हैं। अतः गरीबों और मध्यमवर्गीय परिवारों की पीड़ा को समझते हुए बाजार में बढ़ी दरों को एक चौथाई कर दीजिए। मिलावटखोरों, भ्रष्टाचारियों, जमाखोरों, अपराधियों व देशद्रोहियों को मौत की सजा दीजिए व नैतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए बाजार में हर वस्तु के दाम कम कर दीजिए। फिर देखिए, देश भर में हर रोज दीपावली ही दीपावली है। बस, आप थोड़ी सख्ती कीजिए। बाजार भाव स्वतः ही नियंत्रण में आ जाएँगे व खाद्य सामग्री की गुणवत्ता भी बढ़ जाएगी। वैसे भी कहा जाता है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच
33 वर्धमान नगर, जोधपुरी की ढाणी, खेमे का कुआँ, पालरोड, जोधपुर, राजस्थान


