“स्वतंत्रता” जो मन में आए वह करने का लाइसेंस नहीं

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

विवाह के बाद महिला या पुरुष विजातीय दोस्त रख सकते हैं। अब यह सवाल 2021 के साल में पूछा जाए या इस पर चर्चा की जाए तो यह हास्यास्पद या पुराना लगेगा। पर विवाहेतर संबंधों के कारण हो रही हत्याओं या आत्महत्याओं को देखते हुए यही लगता है कि इस मुद्दे पर स्वस्थता और सख्ती से चर्चा होनी चाहिए। खेड़ब्रह्मा इलाके के भील आदिवासियों में गोठी और गोठण (ब्वॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड) एकदम सामान्य बात मानी जाती है। लड़के और लड़कियां एकदूसरे के साथ पक्की दोस्ती कर सकते हैं। यही नहीं, सहज रूप से वे शारीरिक संबंध भी बना सकते हैं। इससे भी आगे, इस दोस्ती में महिला को बच्चा भी हो जाए तो कोई बात नही है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि महिला को हल्दी लग रही होती है तो उसकी गोद में बच्चा खेल रहा होता है।

इतनी छूट, इतनी स्वतंत्रता, इतना खुलापन, जबकि अब की बात जरा अलग है। शादी के पहले भले ही लड़का-लड़की दोस्ती करें, इच्छा हो तो सेक्स संबंध भी बनाएं, बच्चा हो भी जाए, पर शादी होने के बाद बात एकदम अलग हो जाती है। उसके बाद सब एकदम से भूल जाना होता है। गोठी या गोठण को सपने में भी नहीं याद करना होता। मानलीजिए कि शादी के बाद कोई युवक पुराने संबंध को बनाए रखने की कोशिश करता है तो उसे सख्त सजा दी जाती है। वह सजा मौत भी हो सकती है। यह उनकी परंपरा है। जबकि आधुनिकता के वायरस के कारण और अनेक समाज सुधारकों की जहमत की वजह से अब इसमें सुधार हुआ है। विजातीय मित्रता और विवाहेतर संबंध हमेशा चर्चा में रहने वाले मुद्दे हैं।

नितिन इंजीनियर है। उसकी पत्नी का नाम पूजा है। नितिन का एक खास दोस्त है दिनेश। सब से करीबी दोस्त होने की वजह से स्वाभाविक है कि दिनेश नितिन के घर भी आता-जाता है। पूजा को भाभी कह कर बुलाता है। दोनों में खूब बनती है। दिनेश हंसता खूब है, इसलिए वह जब भी नितिन के घर आता है, नितिन के घर का माहौल एकदम हंसी-खुशी वाला हो जाता है। दिनेश और पूजा की मित्रता या नजदीकी नितिन के लिए सहज चिंता का विषय नहीं थी। इसकी वजह यह थी कि उसे दिनेश पर पूरा भरोसा था। नितिन को खुद के बारे में जितना पता नहीं होता था, उससे ज्यादा दिनेश को पता होता था, इस तरह की दोनों में दोस्ती थी।

नितिन को दिनेश पर अटल विश्वास था। इसके अलावा नितिन खानदानी घर का चरित्रवान युवक था। दिनेश और पूजा के बीच की नजदीकी में नितिन को कोई आपत्ति नहीं थी। 3 साल बाद नितिन को कंपनी के काम से 2 महीने के लिए अकेले ही जर्मनी जाना पड़ा। इन 2 महीनों के दौरान दिनेश और पूजा को अपने विश्वास और नजदीकी को और मजबूत करने का मौका मिल गया। सही बात तो यह थी कि दोनों के मनों में परस्पर शुद्ध मित्रता ही थी। अलबत्त, स्त्री और पुरुष के बीच चाहे जैसी भी मित्रता या परिचय हो, उस के पीछे प्रच्छन्न रूप से गुप्त रूप से सेक्स छुपा होता है। जैसे ही मौका मिलता है यह सेक्स या लगाव बाहर आ जाता है। यहां भी ऐसा ही हुआ। नितिन की अनुपस्थिति में पूजा और दिनेश को खूब सानिध्य प्राप्त हुआ। स्वतंत्रता यानी किसी से कुछ पूछने का कोई अर्थ नहीं था। पर जैसा अधिकतर लोग करते हैं Liberty should not go to license… स्वतंत्रता चाहे कुछ भी करने का लाइसेंस नहीं। पर यहां ऐसा हो गया।

एक रात दिनेश पूजा के घर रुक गया। पूजा और दिनेश के बीच आज तक मित्रभावना के पीछे जो सेक्स की वृत्ति गहराई में छुपी थी, वह बाहर आ गई। मित्रता टूट गई। दोनों के हृदय में सुषुप्त अवस्था में पड़ा विपरीत लिंग का आकर्षण और आवेग प्रकट हुआ और दोनों ने आपसी सहमति से, राजी-खुशी से शारीरिक सुख प्राप्त किया। सुख और शारीरिक सुख में बहुत बड़ा फर्क है। वेसे तो सुख खुद ही एक ठगने वाला प्रदेश है। उसमें शारीरिक सुख तो उससे भी नीचे का इलाका है।

सब से ऊपर होता है आनंद। उससे नीचे होता है सुख का प्रदेश और उससे थोड़ा नीचे उतरो तो होता है शारीरिक सुख। शारीरिक सुख क्षणिक होता है, पर इसका आकर्षण सदियों से बरकरार है। 2 महीने बाद नितिन जर्मनी से वापस आया। पूजा औय दिनेश ने अपना मित्रवत व्यवहार पूर्ववत कर लिया। पर अब मैत्री शुद्ध नहीं थी। बात बदल गई थी। दोनों एकदूसरे से मिले बगैर नहीं रह सकते थे। एक दिन छुप कर दोनों मिले, पर नितिन को पता चल गया। नितिन के लिए यह जीवन का सब से बड़ा आघात था। उसे बहुत गुस्सा आया। उस गुस्से में उसने दिनेश पर हमला किया।

उसके हाथों अपने जिगरी दोस्त की हत्या हो गई। आखिर ऐसा क्यों हुआ? यह सवाल करने से पहले महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ऐसा तो बारबार होता रहा है। अब सोचने वाली बात है कि इसे रोकने का क्या उपाय है? इस बारे में मुद्दे के अनुसार चर्चा करते हैं। पहली बात तो यह है कि इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि महिला और पुरुष के बीच विपरीत लिंगी आकर्षण होता है। यह प्राकृतिक व्यवस्था है। कोई भी महिला या पुरुष विपरीत लिंगी पात्र के प्रति आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता। इसमें जब अपनी पसंद का पात्र सामने आ जाता है तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है।

महिला और पुरुष के बीच की दोस्ती अस्वीकार नहीं की जा सकती। पर उसके बुरे परिणामों को स्वीकार करना चाहिए। पति-पत्नी, दोनों ही विपरीत लिंगी दोस्त की ओर अधिक से अधिक कोमल हृदय और मन रखते हैं। पर फैशन स्टेटस या सभ्यता को समझते हैं। पर उसमें मिलजुल कर याद रखना या बुरे परिणाम का डर है।

समय परिवर्तनशील है। समयसमय पर सामाजिक कार्य और मान्यताएं बदलती रहती हैं। बदलती रहनी भी चाहिए। इसका विरोध भी नहीं किया जा सकता। विवाह के बाद स्त्री या पुरुष की दोस्ती का संबंध एकतरफा रखना चाहिए अब यह बात प्रस्थापित हो चुकी है। अनेक शादीशुदा पुरुष यानी पति वट से, प्रेम से, आनंद से पत्नी के मित्रों की पहचान कराते मिल जाएंगे। वह कहते हैं कि यह युवक मेरी पत्नी का मित्र है। पत्निथां भी निखालसता से अपने पति की महिला दोस्तों का परिचय कराती हैं। इसे मुक्त समाज का एक लक्षण माना जा सकता है। वैसे तो यह आनंद का विषय है। पर इसमें खतरा भी है। महिला और पुरुष को विवाह कर के एकरूप होना चाहिए। यह विवाहसंस्था की सब से पहली और महत्वपूर्ण जरूरत है। अगर पति और पत्नी का एकदूसरे के साथ का प्रेमभाव मजबूत होगा तो उनकी ट्यूनिंग जबरदस्त होगी, उनकी बांइडिंग मजबूत होगी तो खास सवाल नहीं उठेंगें। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सवाल उठेंगें और ऐसे सवाल उठेंगे कि उनका हल निकालना मुश्किल होगा।

अगर पति और पत्नी मुक्त वातावरण में एकदूसरे को मित्रता की छूट देना चाह रहे हों या दे रहे हों तो उन्हें अपने हृदय को हमेशा शुद्ध और मजबूत रखना चाहिए। शुद्ध इसलिए कि उनमें कोई गलत या कमजोर भाव पैदा होगा तो निश्चित उसका असर सामने वाले पात्र पर पड़ेगा। मजबूत इसलिए कि विपरीत लिंग के आकर्षण के कारण अगर सामने वाला पात्र दूसरे किसी के अधिक नजदीक आ जाए तो दिल टूट न जाए इस बात का ध्यान रखना होगा।

विवाह के बाद महिला और पुरुष का परस्पर का प्यार और समझ कितना मजबूत है, इस बात पर निर्भर करता है। स्वतंत्रता अलग चीज है और विजातीय आकर्षण की तीव्रता अलग मामला है। महिला या पुरुष को जब मित्रता के नाम या बहाने विजातीय पात्र के नजदीक रहने और जाने का मौका मिलता है। तब एक निश्चित वातावरण तैयार होता है। यहां स्वतंत्रता की कसौटी होती है। सही में खुद को मिली स्वतंत्रता को संभालना कभी-कभार मुश्किल हो जाता है। विजातीय पात्र का आकर्षण लगभग सभी में होता है। यह प्राकृतिक वस्तु है। जब भी मौका मिलता है, यह आकर्षण तमाम बंधनों को तोड़ देता है। मनोविज्ञान तो यह कहता है कि भाई-बहन को भी लंबे समय तक एक कमरे में नहीं रहना चाहिए। किसी को भी यह बात अनुचित लगेगी, परंतु इसमें जो तर्क और भाव मिला है, उसे समझना चाहिए। महिला और पुरुष जब नजदीक आते हैं तो उनमें एक परस्पर का अदम्य विजातीय आकर्षण पैदा होता है। सामाजिक बंधन और परस्पर एक न होने की प्रतिकूलताओं के कारण यह आकर्षण रुक जाता है अथवा इस क्रम को रोके रखता है। फिर जैसे ही मौका मिलता है, वह अपना काम करता है। ऐसी स्थिति में इस मामले में समझदारी यह है कि अपनी मित्रता को मिली छूट का एक हिसाब से उपयोग करें। जबकि उस हिसाब को खुद ही तय करना है। अगर बाहर से अंकुश लगाया जाए तो वह अंकुश जहरीला लगता है। अंदर का ही अंकुश उपयोगी होता है।

सब से महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि जहां तक संभव हो शादीशुदा महिला या पुरुष को एक निश्चित नियम खुद पर लाद लेना चाहिए। हम जानते हैं कि प्रेम कोई सीमा नहीं मानता। अलबत्त, जब कोई भी व्यक्ति विवाह करता है तो उसे अच्छा लगे या न लगे, उसे संयम की सीमा में रहना पड़ता है। यह एक विरोधी परिस्थिति होती है। हृदय में बसा प्रेम उसे अनेक पात्रों की ओर खींचता है। जबकि सामाजिक नियम उसे रोकते हैं। ऐसी स्थिति में अगर विवाहेतर संबंधों के खतरे से बचना है तो व्यक्ति को एक निश्चित प्रतिबंध खुद पर लाद लेना चाहिए। जैसे कि रात का स्वभाव अंधेरे का होता है। इसलिए महिला हो या पुरुष, उसे तय कर लेना चाहिए कि देर रात तक कभी किसी पार्टी में नहीं रुकना है। रात अपना काम किए बगैर नहीं रहती। इसी तरह यह भी तय करना है कि कभी भी किसी विजातीय व्यक्ति के साथ लंबे समय तक नहीं रहना है। इसमें खतरा है। जरूरत हो तो अकेले या अकेली रह लें। परंतु उस समय स्थिति संभाल लें। अक्सर ऐसा होता है कि आप खुद को संयम में रख सकती हैं। पर कभी ऐसा संयोग आ जाता है कि आप ढ़ीली पड़ जाती हैं।

दिल्ली की एक महिला के जीवन में कुछ ऐसा ही हुआ। वह सीधी लाइन पर चलने वाली महिला थी। अपने पति की वफादार। पर उनकी पड़ोसन को अचानक मायके जाना पड़ा। पड़ोसन ने अपने पति के खाने की जिम्मेदारी उसे सौंप दी। पड़ोसन के उस पति को वह महिला पहले से ही बहुत अच्छी लगती थी। पर वह पति की वफादार थी, इसलिए उसने कभी उसके प्रति गलत विचार नहीं किया था। पर उसके यहां खाना खातेखाते उसका मन विचलित हो उठा और वह उसके करीब जाने की कोशिश करने लगा। अंत में वह अपने मकसद में कामयाब हो गया। क्योंकि शायद वह महिला भी उसे पसंद करती थी। पर सामाजिक बंधनों की वजह से अपनी इच्छा को दबाए थी। एक रात पड़ोसी किसी वजह से देर से आया। बस, उसी रात जो नहीं होना चाहिए था, वह हो गया।

संयोगवश वह पड़ोसन कमजोर पड गई और मन जीत गया। पर बाद में उसे लगा कि उसने बहुत बड़ी गलती कर डाली है। वह खुद को अपराधी मानने लगी। हैरानी की बात यह कि उसने आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में उसने लिखा कि उससे बहुत बड़ी गलती हो गई है। जिसके लिए वह खुद को माफ नहीं कर सकती।

कैसी आफत, जो नहीं होना चाहिए था, वह हो गया। अगर उस महिला ने उस रात खुद पर जोर दे कर संयम रख लिया होता तो शायद यह स्थिति न आती। विवाहेतर संबंध, यह सदियों से चली आ रही समस्या है। पर ऐसे भी तमाम लोग हैं, जो इसे समस्या नहीं मानते। ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि परस्पर सहमति से वयस्क लोग विवाहेतर संबंध बनाए रखते हैं तो इसमें गलत क्या है। अगर इससे दोनों को आनंद आता है तो इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। सही बात तो यह है कि जब विवाह की खोज हुई, तभी से विवाहेतर संबंध की नींव पड़ गई थी।

इस पूरी चर्चा का सार यह है कि अगर जीवन में चिंता और परेशानी से दूर रहना है तो खुद पर अनेक नियंत्रण लाद लेना जरूरी है। ऐसा करने पर जीवन जीने में अधिक मजा आएगा। अक्सर महिला या पुरुष गलत नहीं होते। ऐसी स्थिति में स्त्री या पुरुष को अधिक जिम्मेदारी का व्यवहार करना पड़ता है। दिल में बसी खानदानी ऐसे समय में काम आती है।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

लेखक एवं कवि

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जेड-436-ए, सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उत्तर प्रदेश) मो: 8368681336

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देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

 

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