विश्वास की नींव

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सुनील कुमार माथुर

लोग प्रायः यह कहतें है कि इंसान क्रोध व अंहकार व गुस्से में गलत निर्णय ले लेते हैं व बाद में जब उन्हें पता चलता हैं कि उनका निर्णय सही नहीं है लेकिन अंहकारवश वे अपने फैसलें से पीछे नहीं हटते हैं । अंहकार तो रावण को भी ले डूबा , भला यह किस खेत की मूली हैं । अतः क्रोध व अंहकार का त्याग कर इंसान को एक – दूसरे की मदद करनी चाहिए । प्यार , प्रेम , स्नेह , वात्सल्य भाव के साथ हर व्यक्ति को रहना चाहिए ।

अपनी गलती की क्षमा मांगने से कोई इंसान छोटा नहीं हो जाता हैं । ऐसी बातें हम हर रोज किसी न किसी के मुख से सुनते हैं । अगर कोई जरा उनसे पूछे कि तुमने किससे प्रेम किया । आपने तो केवल धन – दौलत व स्वार्थ की खातिर प्रेम का दिखावा किया । प्रेम का नाटक किया । अगर आप दूसरों को बदलने का प्रयास कर रहें हो तो फिर खुद को ही क्यों नहीं बदल लेते हो ।

खुद क्रोध , अंहकार का त्याग क्यों नहीं करते । दूसरों को उपदेश देना आसान हैं लेकिन सत्य पर अमल करना कठिन कार्य हैं । याद रखिये कि कभी भी किसी का विश्वास न तोडे चूंकि यह दुनियां विश्वास की नींव पर ही टिकी हुई है । दुनियां में छल कपट, लोभ लालच, ठगी , फरेब , धोखाधडी , बेईमानी , भ्रष्टाचार , छीना झपटी का जमाना हैं इसके बावजूद भी यह दुनियां विश्वास पर चल रहीं है ।

अगर कोई आप पर अत्यधिक विश्वास करता हैं तो आप उसे उसकी लाचारी या कमजोरी न समझें । यह सत्य है कि दुनियां में कभी भी किसी का काम नहीं रूकता हैं और वक्त बेवक्त सभी के कार्य सम्पन्न होते हैं । ऐसे में अगर कोई इपका अपना आपकी कोई मदद नहीं करता हैं तो इसमें कैसी गिला शिकायत ।

आप दूसरों को हजार बार अपने आप पर संयम रखनें की सीख देते हो तो अपने आप पर संयम क्यों नहीं रखते । यह जीवन तो प्रभु का दिया हुआ अनोखा उपहार है और जहां प्रेम, स्नेह , विश्वास व वात्सल्य का भाव जागृत होता हैं जब दोनों पक्षों के जीवन के दोनों पलडे बराबर के हो । चूंकि ताली दोनों हाथों से बजती हैं न कि एक हाथ से ।

आप दूसरों को अंहकारी कहते हो लेकिन आप अपने अंहकार का त्याग क्यों नहीं करते हो । यह ठीक हैं कि जो वृक्ष जितना झुकता हैं वह उतनी ही नम्रता को दर्शाता है लेकिन आप अपने स्वभाव को नम्र क्यों नहीं बनाते । दूसरों को राय देना आसान हैं लेकिन स्वंय उस रास्ते चलना कठिन क्यों ? कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरों को बदलने के बजाय अपने आपको बदलिये चूंकि हर किसी को दूसरों में ही अवगुण नजर आते हैं खुद में नहीं । यहीं विचारों में टकराव पैदा होता हैं जिससे समाज व राष्ट्र का वातावरण दूषित होता हैं ।

याद रखिये अगर आप भले हैं तो यह जग भला हैं और आप बुरे हैं तो यह जग बुरा हैं । इसलिए जहां तक संभव हो सके जीवन में ईमानदारी व निष्ठा के साथ कार्य करें व दूसरों के घरों में झांकना बंद करें । तभी आप आदर्श जीवन व्यतीत कर सकतें है अन्यथा दूसरों में कमियां ढूंढते रहिऐ और जिन्दगी भर रोते रहिए ।

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