कविता : स्त्री को मैं नमन करता हूँ… स्त्री माता होती है, स्त्री बहन होती है, स्त्री जगत...
साहित्य लहर
कविता : मैंने देखा है… बच्चे खेलते नंगे धूल में संघर्ष ही देखते थे फूल में खेल खेल...
कविता : डगरिया… कवि रसखान की एक सवैया गोकुल आएंगे जब सांवरिया ब्रज में बजे कोई बंसुरिया कोयल सबको...
पुस्तक समीक्षा : सबरस समाहित अद्वितीय कृति है ‘निहारिका’… इस पुस्तक में आम आदमी की छटपटाहट की...
कविता : आमजन का हो ख्याल… भूल चुके है सैर सपाटे सारी कमाई खा जाता पेट बिजली पानी...
कविता : पछतावा… ज्ञानराशि संचित कर खूब लुटाऊंगा कवि- लेखक बन मां भारती के गुण गाऊंगा राष्ट्र...
कविता : कुप्रथा है दहेज प्रथा… तेरी दुल्हन बनकर जब तेरे, घर आई थी। ढेरों सपने साथ लेके...
कविता : आम के मंजर… तुम्हारा मन तालाब के किनारे पीपल की छाया में भूले बिसरे गीतों...
कविता : वसंत का आंगन… झुरमुट में झरबेरियां रसभरी मेले में बाजार आयीं औरतें वापस गांव चल...
कविता : फूल… मैं धरती की सुंदरता हूं, मां के आंचल में खिलती हूं। रंग बिरंगे रंगों...














