बाॅडी डिसमाॅर्फिया डिशार्डर : आप तो इस रोग का शिकार नहीं?

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स्नेहा सिंह

अभी जल्दी ही हालीवुड ऐक्ट्रेस फाॅक्स ने सार्वजनिक रूप से अपनी बीमारी के बारे में स्वीकार करते हुए कहा था कि ‘हां, मुझे बाॅडी डिसमाॅर्फिया है। काफी समय से मैं इस बीमारी से पीड़ित हूं। मैं जानती हूं की इस बीमारी के कारण मेरे नजदीकी लोगों को तमाम दिक्कतें सहन करनी पड़ती हैं, पर मैं क्या करूं? यह बीमारी आसानी से मेरा पीछा छोड़ने वाली नहीं है। मेगन से पहले यह बीमारी एंजलीना जोली को हो चुकी है।

एक समय जब वह ब्राड पीट के साथ रहती थीं, तब अपनी सुंदरता को ले कर उनके अंदर तमाम शंकाएं थीं। कभी सोचा है कि यह समस्या हम में से भी कितनी महिलाओं को अंदर ही अंदर हो सकती है। जबकि अपनी सुंदरता को ले कर थोड़ा-बहुत असंतोष तो शायद हर महिला में होता है। अपने शरीर के अमुकतमुक अंग ऐसे होने चाहिए, अगर इस तरह होती, तो बहुत सुंदर लग रही होती। इस वाक्य के आगेपीछे लगने वाले संयोजक ‘अगर’ बहुत खूंखार होते हैं।

क्योंकि मनुष्य के दिमाग में अगर और तो के विचार आएं और वह उसे साकार करने का प्रयास शुरू कर देता है। अगर प्रयास अच्छे कार्य के लिए और अच्छी दिशा में किए जा रहे हों तो कोई प्राब्लम नहीं है। पर इस प्रयास से अगर नुकसान हो रहा है, तब यह गलत है। शायद हम में से ऐसी तमाम महिलाएं होंगीं, जिन्हें इस विकार के बारे में कोई जानकारी नहीं होगी। तमाम पेशेंट ऐसी होंगी, जो इस समस्या से पीड़ित हो कर डिप्रेशन तक पहुंच जाती हैं। क्योंकि उन्हें अंदाजा ही नहीं होता कि वे बाॅडी डिसमाॅर्फिया से पीड़ित हैं।

यहां यह बात करने का मुख्य आशय यह है कि पुरुषों की अपेक्षा बाॅडी डिसमाॅर्फिया डिशआर्डर महिलाओं में अधिक होता है। इस समय यह समस्या कुछ अधिक ही फन काढ़ रही है। इसलिए इसके बारे में चेत जाना जरूरी है। एक जानेमाने साइकोलाॅजिस्ट डाक्टर का कहना है कि बाॅडी डिसमाॅर्फिया 12 से ले कर 22 साल की उम्र के दौरान अधिक होती है। उसके बाद 35 से ले कर 40 साल के बीच अधिक पेशेंट देखने को मिलते हैं।

क्या है बाॅडी डिसमाॅर्फिया?

मेगन फाॅक्स ने सार्वजनिक रूप से अपनी बीमारी के बारे में बात की तो मीडिया द्वारा उनसे सवाल किए गए कि आप अपनी मानसिक हालत के बारे में भरी बाजार में कैमरा के सामने कर रही हैं। आप को पता है कि यह बात देश-विदेश के लोगों तथा आप के फैंस तक पहुंचेगी? क्या आप को अपनी इमेज खराब होने का डर नहीं लग रहा? तब मेगन ने बहुत ही हृदयस्पर्शी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि ‘हां, मुझे डर लग है। दूसरे अन्य डर की तरह मुझे इस बात का भी डर लग है।

पर मैं अपनी बीमारी से जितना दूर भागूंगी, यह मेरा उतना अधिक पीछा करेगी। इससे अच्छा है कि मैं इसे स्वीकार कर लूं। मैं अपना उदाहरण दे कर करोड़ो लोगों को चेताना चाहती हूं कि आप के अंदर भी इस तरह के कोई सिम्पटम्स हों तो जितनी जल्दी हो सके, डाक्टर से संपर्क करें। यह बीमारी भयंकर रूप धारण करे, उससे पहले ही चेत जाएं। बाॅडी डिसमाॅर्फिया डिसआर्डर क्या है? यह एक ऐसा डिसआर्डर है, जिसके होने पर व्यक्ति को अपनी सुंदरता के बारे में समस्या होती है।

व्यक्ति अपनी सुंदरता की तुलना हमेशा दूसरों से करता रहता है। अपनी बात की तुलना, अपने समग्र बाॅडी पार्ट की तुलना करते हुए वह हमेशा इस बात को ले कर दुखी होता रहता है कि हमारा फलां अंग इस तरह होता तो कितना अच्छा होता। मेरा वजन कम होता और मैं भी किसी ऐक्ट्रेस की तलह बाॅडी शेप वाली होती तो कितना अच्छा होता। यह बीमारी होने पर पेशेंट खुद को बारबार आईने में देखता रहता है और जितनी बार देखता है, उतनी बार अपनी सुंदरता में कमी खोजता है।

शुरूशुरू में समस्या हल्की होती है, तब पेशेंट अपने विचार मन में ही रख लेता है। पर जब समस्या बढ़ जाती है तो पेशेंट के मन में अपनी कमी के आने वाले विचार उसे खटकने लगते हैं। परिणामस्वरूप अपनी कमी की भरपाई करने के लिए नित नए प्रयोग करने लगती हैं। पेशेंट अपनी सुंदरता को ठीक करने के लिए तमाम रिस्क उठाता है और तमाम पैसा खर्च करता है। पर इतना सब करने पर भी उसे सफलता नहीं मिलती।

बारबार आईने में देखते रहने, अपने अंगों-उपांगों को देख कर दूसरे से खुद की बराबरी कर के अपने अंगों को श्रेष्ठ बनाने का पागलपन (यहां इच्छा शब्द का उपयोग नहीं किया। इच्छा तो हर किसी की होती है। पर हर किसी की इच्छा पूरी नहीं हो सकती, यह समझ नार्मल लोगों में होती है। जबकि डिसमाॅर्फिया डिसआर्डर वाले पेशेंट के अंदर सुंदरता की कमी पूरी करने की इच्छा नहीं पागलपन होता है, जिसे वह किसी भी तरह पूरी करना चाहता है)। अपने रंग को अधिक से अधिक निखारने का पागलपन, अपनी त्वचा को बेस्ट बनाने का पागलपन, संक्षेप में ऐसा तमाम पागलपन, जिन्हें पूरा कर के पेशेंट मन में यही सोचता है कि उसे दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ दिखाई देना चाहिए। ये तमाम पागलपन बाॅडी जिसमाॅर्फिया डिसआर्डर के लक्षण हैं।

सुंदर दिखाई देने का हक सभी को है, पर पागलपन नहीं होना चाहिए

अलबत्त, सुंदर दिखाई देने का हक सभी को है, पर सुंदर लगने के पीछे पागल न बनें। शरीर का कोई अंग कम सुंदर हो तो उसे ठीक करने के लिए तरहतरह के प्रयास किए जा सकते हैं। पर बारबार सर्जरी कराना, तमाम पैसा खर्च करना। और अगर यह सब न करा सके तो गुस्सा करना। यह सब करना गलत है। शरीर को नुकसान पहुंचा कर सुंदरता प्राप्त करना यह भी बाॅडी डिसमाॅर्फिया के ही लक्षण हैं।

आजकल की जनरेशन पतली काया के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। साइकोलाॅजिस्ट का कहना है कि बाॅडी डिसमाॅर्फिया वाले पेशेंट को अपने वजन को ले कर परेशानी होती है तो उसे कम करने या बढ़ाने के लिए कुछ भी कर सकता है। इसमें सामान्य लोग और सेलिब्रिटी सभी आ जाते हैं। विज्ञान दिमाग में बनने वाले केमिकल को इस बीमारी का कारण बताता है। जबकि इसके अलावा सोशल मीडिया, देखादेखी की वृत्ति, असंतोष, अटेंशन प्राप्त करने की जिजीविषा भी इस बीमारी के होने की वजह है।

0 बाॅडी डिसमाॅर्फिया मतलब खुद को स्वीकार न करना

विज्ञान के अनुसार दिमाग के अमुक भाग में जो केमिकल बनता है, वह भाग पूरे शरीर को कार्यरत करने का काम करता है। उस केमिकल्स में कोई समस्या आती है यानी यह डिसआर्डर हो सकता है। इसके अलावा कोई खराब अनुभव हुआ हो। कभी-कभी ऐसा होता है कि एकदम यंग एज में किसी के प्रति आकर्षण पैदा हो जाए और वह व्यक्ति आप की सुंदरता की वजह से आप की अवहेलना करे तो आप को बाॅडी डिसमार्फिया डिसआर्डर की समस्या हो सकती है।

खास कर ग्लेमर वर्ल्ड में जाने की इच्छा रखने वाली महिलाओं में यह समस्या बड़ी आसानी से हो सकती है। अटेंशन लेने की आदत हो और पूरी तरह अटेंशन न मिल रहा हो तो भी यह समस्या हो सकती है। इन सभी समस्याओं के होने के पीछे कारण खुद को स्वीकार न कर सकने की वृत्ति है। यह भी सत्य है कि कोई भी व्यक्ति सुंदरता या गुण में संपूर्ण नहीं होता। इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। अगर इसे स्वीकार नहीं करेंगी तो यह बीमारी मन और दिमाग दोनों पर हावी हो जाएगी।

डाक्टर की सलाह लेने में कोई परेशानी नहीं

हमारे समाज में साइकोलाॅजिकल समस्या को बहुत ही खराब तरह से देखा जाता है। परिणामस्वरूप इस बारे में इलाज कराने जाने में भी लोग घबराते है। इलाज कराने से कतराने की वजह से समस्या बढ़ जाती है। बाॅडी डिसमाॅर्फिया की समस्या आगे जा कर एंजायटी, हैवी डिप्रेशन, सेल्फ डैमेज का रूप धारण कर सकती है। इसलिए समस्या विकराल हो, उसके पहले ही इलाज करा लेना जरूरी है। वैसे भी इसका इलाज कोई मुश्किल नहीं है। काउंसलिंग, दवाएं और मेडिटेशन से यह समस्या दूर हो सकती है। पर सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि पेशेंट को खुद ही अपने अंदर आत्मविश्वास लाना पड़ेगा और खुद को खुले मन से स्वीकार करना होगा। याद रखिए, कोई भी सम्पूर्ण
और सर्वगुण संपन्न नहीं होता।

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