पत्र में फिल्म ‘हनुमान अंश’ की बढ़ती लोकप्रियता और उसके माध्यम से आध्यात्मिकता एवं भक्ति के प्रति जागृत हो रही जनचेतना का उल्लेख किया गया है। लेखक ने फिल्म को टैक्स फ्री किए जाने की चर्चा करते हुए अन्य राज्यों से भी ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन देने की अपेक्षा जताई है। पत्र में क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्मों के निर्माण और दर्शकों को उनकी अपनी भाषा में स्वच्छ मनोरंजन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
- भक्ति से जागी आध्यात्मिक चेतना
- आध्यात्मिक फिल्मों को मिले प्रोत्साहन
- क्षेत्रीय फिल्मों को टैक्स फ्री करने की मांग
- भक्ति और सिनेमा का संगम
सुनील कुमार माथुर
पिछले कुछ समय से समाचार पत्रों में बराबर यह पढ़ने को मिल रहा है कि फिल्म ‘हनुमान अंश’ को देखने के प्रति दर्शकों का उत्साह दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। दो करोड़ में बनी इस फिल्म ने अब तक साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए कमा लिए, जो एक आश्चर्य की बात है। वर्ष 1975 में आई फिल्म ‘जय संतोषी मां’ ने आध्यात्मिकता का जो असर दिखाया था, उसके 50 वर्षों बाद फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने आध्यात्मिकता की जो गंगा बहाई है, वह वंदनीय व सराहनीय कार्य है।
नीम करोली बाबा की जीवन यात्रा पर बनी इस फिल्म ने अध्यात्म के प्रति जो जन चेतना जगाई, वह किसी भी चमत्कार से कम नहीं है। तभी तो कहा जाता है कि चमत्कार को नमस्कार है। इस फिल्म ने भक्ति का जो संचार किया है, वह यह दर्शाता है कि भक्ति में ही शक्ति है।
उत्तराखंड सरकार व छत्तीसगढ़ की सरकार ने इस फिल्म को टैक्स फ्री किया है, ठीक वैसे ही अन्य सरकारों को भी अपने-अपने राज्यों में इस फिल्म को टैक्स फ्री करना चाहिए व अपने ही राज्य की भाषा में बनी फिल्मों को भी टैक्स फ्री करना चाहिए, ताकि फिल्म निर्माता व निर्देशक क्षेत्रीय भाषा में फिल्में बना कर दर्शकों को उनकी भाषा में ही स्वच्छ मनोरंजन दे सकें।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पालरोड, जोधपुर, राजस्थान

