
देहरादून में पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के निधन पर पूरे प्रदेश में शोक की लहर है। उन्हें आधुनिक सड़क संरचना के वास्तुकार और उत्तराखंड में सुशासन की मजबूत पहचान देने वाले नेता के रूप में याद किया जा रहा है। 2011 में भाजपा ने ‘खंडूड़ी है जरूरी’ नारे के साथ चुनाव लड़ा था और उनके नेतृत्व में सख्त लोकायुक्त बिल समेत कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए थे।
- उत्तराखंड में सुशासन का चेहरा बने थे मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी
- स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना को समय पर पूरा कराने वाले नेता थे खंडूड़ी
- ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ जैसे फैसलों से चर्चा में रहे बीसी खंडूड़ी
- 2011 में भाजपा की सियासत का सबसे बड़ा चेहरा बने थे जनरल खंडूड़ी
देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और देश की आधुनिक सड़क संरचना को नई दिशा देने वाले वरिष्ठ नेता बीसी खंडूड़ी के निधन से प्रदेशभर में शोक की लहर है। सैन्य पृष्ठभूमि से राजनीति में आए जनरल खंडूड़ी को उनकी सादगी, अनुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रवैये के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उत्तराखंड की राजनीति में उन्हें सुशासन का प्रतीक माना जाता रहा है। मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी ने उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ एक मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं रही।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने देश की सड़क व्यवस्था को नई दिशा देने का काम किया। स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने देश की आर्थिक और औद्योगिक गति को नई मजबूती दी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जरिए गांव-गांव तक सड़क पहुंचाने में भी उन्होंने अहम योगदान दिया। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क संपर्क बढ़ाने के लिए उनकी कार्यशैली और सैन्य अनुशासन काफी प्रभावी साबित हुआ। उत्तराखंड समेत देश के दूरस्थ इलाकों में सड़क कनेक्टिविटी मजबूत करने के कारण उन्हें आधुनिक सड़क संरचना का वास्तुकार कहा जाता है।
उत्तराखंड में उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल भी कई ऐतिहासिक फैसलों के लिए याद किया जाता है। 8 मार्च 2007 से 27 जून 2009 तक और फिर 11 सितंबर 2011 से मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर विशेष जोर दिया। वर्ष 2011 में जब देशभर में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चरम पर था, तब जनरल खंडूड़ी ने उत्तराखंड में देश के सबसे सख्त लोकायुक्त विधेयकों में से एक पेश किया। इस कानून के दायरे में मुख्यमंत्री को भी शामिल किया गया था, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा बटोरी।
उन्होंने सरकारी सेवाओं को समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराने के लिए कानून लागू किया ताकि आम लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। तबादला नीति में पारदर्शिता लाने और सिफारिश आधारित ट्रांसफरों पर रोक लगाने की दिशा में भी उन्होंने सख्त कदम उठाए। उनका स्पष्ट संदेश था— “काम नहीं तो वेतन नहीं।” वर्ष 2011 में जब भाजपा सरकार विभिन्न विवादों के कारण दबाव में थी, तब पार्टी आलाकमान ने दोबारा जनरल खंडूड़ी पर भरोसा जताया।
उसी दौर में ‘खंडूड़ी है जरूरी’ का नारा पूरे उत्तराखंड में गूंजा और भाजपा ने इसी संदेश के साथ विधानसभा चुनाव लड़ा। उनके नेतृत्व में पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि स्वयं जनरल खंडूड़ी को कोटद्वार सीट पर बेहद मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। यह परिणाम राज्य की राजनीति के सबसे चर्चित उलटफेरों में गिना गया। जनरल खंडूड़ी को आज भी उत्तराखंड में ईमानदार, अनुशासित और विकासोन्मुख राजनीति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनके निधन से राज्य ने एक ऐसे नेता को खो दिया है, जिसकी पहचान सत्ता से अधिक सादगी, कार्यशैली और जनहित के फैसलों से बनी।





