माफी मांगने से इंसान कोई छोटा नहीं हो जाता

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सुनील कुमार माथुर



भगवान अपने भक्त के अधीन होते हैं । वे कभी भी किसी का कर्जा नहीं रखते हैं । उन्हे कोई जितना देता हैं वे उससे दस गुणा वापस देते है । आप जो चीज किसी को देते है वही वापस आपके पास लौट कर आती है । जैसे आप किसी के साथ अच्छा व्यवहार करोगे वह भी आपके साथ अच्छा व्यवहार करेगा । अगर आप किसी के साथ मीठा बोलेगे तो वह भी आपके साथ अच्छा व्यवहार करेगा । मीठा बोलेगा । चाहे उसका व्यवहार भले ही दूसरे के साथ कडवा क्यो न हो कहने का मतलब यह है कि जो हम देते है वैसा ही हमें वापस मिलता है । अगर हम किसी को गाली देते है तो सामने वाला हमें वापस दस गालियाँ देता हैं ।

हर जीव में अच्छे व बुरे गुण होते हैं । अच्छाइयां व बुराईयां होती हैं लेकिन हमें बुराइयों को छोड़ कर केवल गुणों को ही स्वीकार करना चाहिए । आप जब भी भगवान को कुछ चढाते है, भोग लगाते है तो वे कुछ भी नहीं देखते है वे कुछ देखते भी है तो केवल भक्त के भाव को ही देखते है कि भक्त ने किस भाव से पूजा की है व किस भाव से भोग लगाया है । वे तो केवल भक्तों के प्रेम व भाव के भूखे है । अगर सही मायने में भगवान भोग खाना स्वीकार कर लें तो कोई भगवान के भोग लगाने के लिए भी दस बार सोचने लग जाएगा ।

भगवान की कथा जितनी भी सुनी जायें । उनका भजन-कीर्तन, सत्संग कितना भी किया जाए । वह हमेशा कम है । इस जीवन में जितने भी रिश्ते है वे सभी रिश्ते स्वार्थ के ही हैं हम सात फेरे लेकर पत्नि को घर लेकर आते हैं और सुख-दुःख में साथ रहने का वचन लेते है फिर भी पति के मरने के बाद वह शमशान तक भी अपने पति के साथ नहीं जाती है । मात्र अपने घर के द्वार तक ही साथ जातीं है । व्यक्ति के मरने के बाद उसके साथ केवल उसके कर्म ही जाते हैं । यानि कि उसके पाप पुण्य की गठरी ही उसके साथ जातीं है । बाकी सब धन दौलत, मकान, गाडी घोडे, ठाठ बाठ यही धरे रह जाते है ।



जिस पर भगवान का हाथ हो उसका कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड सकता । उसे कोई भी नहीं मार सकता । अगर हमारी भक्ति सच्ची है तो हमें मान – सम्मान एवं अपमान से कोई फर्क नहीं पडता हैं । लेकिन भक्ति कच्ची है तो हम अपने अपमान को सह नहीं पायेंगे । अतः ईश्वर के प्रति भक्ति करों तो सच्ची भक्ति ही करनी चाहिए । जीवन में अंहकार व क्रोध कभी भी न करें । चूंकि इससे तो सदैव नुकसान ही होता हैं । हमें इस नश्वर संसार में भी प्रेम पूर्वक व शांति एवं भाईचारे के साथ मिलजुलकर रहना चाहिए ।

मृत्यु के बाद इस दुनियां में उसी को याद किया जाता हैं जो सदैव दीन दुखियों की सेवा करता हैं । लोक कल्याणकारी कार्य करता हैं और जो भी कृत्य करता हैं उसमें उसका कोई निजी स्वार्थ नहीं होता हैं अपितु वह हर कार्य निस्वार्थ भाव से करता हैं । इस मानव जीवन में आयें है तो हमें अपने लोक व परलोक दोनों सुधारने चाहिए । अतः अधिक से अधिक समय धार्मिक कार्यों में लगाना चाहिए । जीवन में कभी किसी से कोई गलती भी हो जायें तो बिना हिचक गलती के लिए क्षमा मांग लेनी चाहिए । माफी मांगते समय यह न देखें कि सामने वाला छोटा हैं या बडा । बस आप तो अपनी गलती की क्षमा मांग ले । मामला वही समाप्त हो जायेंगा एवं संबंधों में पडने वाली गांठ से बचा जा सकता हैं ।



जिस कार्य में रूचि हैं और आगें बढना हैं उस क्षेत्र में पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ मेहनत करें चूंकि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है और जो लोग मेहनती होते हैं उन्हें सफलता अवश्य ही मिलती हैं इसमें कोई दो राय नहीं है । हमारी सफलता हमारे कठिन परिश्रम व पसीने का ही परिणाम है जिसने जीवन में पसीना नहीं बहाया ( कठिन श्रम नहीं किया ) वह सफलता के मर्म को क्या जानें ।

हमारा जीवन तो दूसरों की सेवा करने के लिए ही हुआ हैं । अतः मोहमाया में न फंसे और नि स्वार्थ भाव से जरूरतमंद लोगों की सेवा करें । व्यक्ति का मन हर क्षण बदलता रहता हैं मन में हर क्षण उठा पटक होते रहते हैं लेकिन जो व्यक्ति हर परिस्थिति में समान रहता हैं समझिये वही ईश्वर के सबसे नजदीक हैं । इसलिए मन पर नियंत्रण रखें व अपने आपको ईश्वर को समर्पित कर दीजिए ।

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