सवालों में ऐसे उलझ गया आफताब

पढ़ें पुलिस के सवाल और आरोपी आफताब के जवाब

इस समाचार को सुनें...

सवालों में ऐसे उलझ गया आफताब, एक तो घर से लाश की बू निकालनी थी, दूसरी मैं ये यकीन कर लेना चाहता था कि घर के अंदर खून या मांस के कोई भी सबूत ना छूट जाए. मैं जानता था

नई दिल्ली। हकीकत की दुनिया में श्रद्धा बेशक मारी जा चुकी थी, लेकिन लोगों की नजरों में धूल झोंकने के लिए आफताब ने उसे वर्चुअल वर्ल्ड में जिंदा रखा हुआ था. वो श्रद्धा की जान लेने के बाद उसके क्रेडिट कार्ड के बिल भरता रहा और सोशल मीडिया पर श्रद्धा का अकाउंट भी हैंडल करता रहा. ताकि उसके दोस्तों और जाननेवालों को श्रद्धा की मौत को लेकर बिल्कुल भी शक ना हो और उन्हें ये लगता रहे कि श्रद्धा अब भी जिंदा है. वो इस कोशिश में काफी हद तक कामयाब भी रहा.

तकरीबन दो महीने तक श्रद्धा के सोशल मीडिया अकाउंट को हैंडल करने के बाद जब जुलाई महीने में आफताब ने ये सिलसिला बंद कर दिया, तो श्रद्धा के दोस्तों को उसकी गुमशुदगी को लेकर शक होने लगा और उन्होंने श्रद्धा के घरवालों से बात की. पुलिस सबूत के तौर पर आफताब के घर के आस-पास छतरपुर पहाड़ी के सीसीटीवी फुटेज भी खंगाल रही है, लेकिन अब तक की छानबीन में पुलिस को ऐसा कोई भी फुटेज हाथ नहीं लगा है, जिससे श्रद्धा के कत्ल की कोई कहानी जुड़ सके.

असल में वारदात को अंजाम दिए गए छह महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है और आम तौर सीसीटीवी फुटेज बैकअप 90 दिन यानी तीन महीनों का ही होता है. लेकिन गलती से पुलिस को श्रद्धा की लाश के टुकड़ों का कोई हिस्सा नहीं मिलता, तो मामला फंस जाएगा. फिर तो पुलिस को पहले यही साबित करना होगा कि श्रद्धा सचमुच मर चुकी है. खुद पुलिस भी इस बात को मानती है कि छह महीने पुरानी लाश के सबूतों को ढूंढना बेहद मुश्किल है. हालांकि सबूत ढूंढने के लिए पुलिस ने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है.

बेशक आफताब अमीन पूनावाला ने श्रद्धा वॉल्कर का कत्ल गुस्से में किया, लेकिन उसके बाद अगले 20 दिनों तक उसने जो कुछ भी किया वो बेहद सोच समझकर किया. कमरे में अपनी मोहब्बत का गला घोंटने के बाद उसकी लाश को ठिकाने लगाना और ठिकाने लगाने से पहले लाश के टुकड़े करना. इन सब चीज़ों के बारे में उसने बहुत बारीकी से सोचा था. इतना ही नहीं, लाश को ठिकाने लगाने के बाद कैसे कमरे से हर सबूत को मिटाना है? उन्हें साफ करना है. इसके बारे में भी बाकायदा उसने स्टडी की थी. जानिए उस कबूलनामे के बारे में जो मुजरिम आफताब ने पुलिस के सामने दिया था.


पुलिस- श्रद्धा का कत्ल कब और कैसे किया?
आफताब- 18 मई बुधवार की रात श्रद्धा से झगड़ा हुआ था. झगड़ा इससे पहले भी होता था. मगर उस रोज बात बढ़ गई. हम दोनों में हाथापाई हुई. फिर मैंने श्रद्धा को पटक दिया. इसके बाद उसके सीने पर बैठ कर दोनों हाथों से उसका गला दबाने लगा. थोड़ी देर बाद ही वो दम तोड़ चुकी थी.


पुलिस- फिर लाश के साथ क्या किया?
आफताब- उस रात श्रद्धा की लाश घसीट कर बाथरूम ले गया. पूरी रात लाश वहीं पड़ी रही.


पुलिस- लाश के टुकड़े कैसे और कब किए?
आफताब- 19 मई को मैं बाजार गया. लोकल मार्केट से तीन सौ लीटर का एक फ्रिज खरीदा. कीर्ति इलेक्ट्रॉनिक शॉप से. एक दूसरे दुकान से आरी खरीदी. फिर मैं घर लौट आया. रात को उसी बाथरूम में आरी से लाश के टुकड़े करने शुरू किए. मैंने कुछ दिनों के लिए शेफ की नौकरी भी की थी. उससे पहले करीब दो हफ्ते की ट्रेनिंग भी ली थी. इस दौरान चिकन और मटन के पीस करने की भी ट्रेनिंग मिली थी. 19 मई को मैंने लाश के कुछ टुकड़े किए थे. उन्हें पॉलीथिन में डाला, फिर उन टुकड़ों को पॉलीथिन समेत फ्रिज के फ्रीजर में रख दिया था. बाकी लाश फ्रिज के निचले हिस्से में.





पुलिस- कितने दिनों तक लाश के टुकड़े किए?
आफताब- दो दिनों तक. 19 और 20 मई को.


पुलिस- लाश के टुकड़ों को ठिकाने लगाना कब शुरू किया?
आफताब- 19 और 20 की रात पहली बार लाश के कुछ टुकड़े फ्रीजर से निकाल कर बैग में रखे थे. पहली रात बैग में कम टुकड़े रखे थे. क्योंकि लाश के टुकड़ों के साथ देर रात बाहर निकलने में घबरा रहा था कि कहीं रास्ते में पुलिस तलाशी ना ले ले.





पुलिस- पहली बार लाश के टुकड़े कहां फेंके?
आफताब- 19 और 20 मई की रात महरौली के जंगल में टुकड़े फेंके थे. पर जंगल के ज्यादा अंदर नहीं गया था.

पुलिस- कितने दिनों में लाश के सारे टुकड़े ठिकाने लगाए?
आफताब- ठीक से याद नहीं, लेकिन कम से कम बीस दिन तक मैं लाश के टुकड़े फेंकता रहा था.





पुलिस- लाश के टुकड़े कहां-कहां फेंके?
आफताब- मैं सिर्फ छतरपुर और महरौली के आस-पास ही जाता था. ज्यादा दूर जाने में पकड़े जाने का खतरा था.

पुलिस- तुम्हें वो सारी जगह याद है?
आफताब- नहीं, लेकिन कुछ जगह पता है. रात में अंधेरा था. इसलिए सारे ठिकाने सही सही याद नहीं.





पुलिस- 20 दिनों तक घर में लाश या लाश के टुकड़े थे. इस दौरान तुम्हारा रुटीन क्या था?
आफताब- चूंकि घर में लाश थी इसलिए मैं घर से बाहर निकलता ही नहीं था. ना ही किसी पड़ोसी से मिलता या बात करता था. मैं बार-बार टुकड़ों को फ्रिज के निचले हिस्से से फ्रीजर में और फ्रीजर में रखे टुकड़ों को नीचे रख कर उनकी अदला-बदली किया करता था. ताकि लाश की बू बाहर ना आ सके. घर, फ्लोर, बाथरूम इन सबकी केमिकल से सफाई किया करता था.





पुलिस- पूरी लाश ठिकाने लगा देने के बाद तुमने क्या किया?
आफताब- मैंने फिर से पूरे घर की सफाई की. फ्रिज खाली होने के बाद फ्रिज को भी केमिकल से अच्छे से साफ किया. बाथरूम, फर्श, दीवार, चादर, कपड़े हर चीज को धोया और साफ किया.

पुलिस- इतनी सफाई क्यों की?
आफताब- एक तो घर से लाश की बू निकालनी थी, दूसरी मैं ये यकीन कर लेना चाहता था कि घर के अंदर खून या मांस के कोई भी सबूत ना छूट जाए. मैं जानता था कभी ना कभी ये सच बाहर आएगा और तब इस घर और फ्रिज की जांच भी होगी. इसीलिए अपनी तरफ से मैंने हर सबूत को धो डाला.





पुलिस- जिससे तुम प्यार करते थे उसकी लाश के साथ ऐसा बर्ताव करने से पहले तुमने एक बार भी कुछ सोचा नहीं?
आफताब- नहीं. मुझे गुस्सा आया था. इसलिए मैंने श्रद्धा को मार डाला लेकिन मैं नहीं चाहता था कि उसकी मौत का सच घर से बाहर जाए. श्रद्धा के घरवाले भी उससे दूर ही रहते थे. उसकी अपने घरवालों से ही बात नहीं होती थी. मुझे पता था कि उसे कोई ढूंढने नहीं आएगा. इसीलिए लाश को इस तरह ठिकाने लगाना जरूरी था और मैंने वही किया.


👉 देवभूमि समाचार में इंटरनेट के माध्यम से पत्रकार और लेखकों की लेखनी को समाचार के रूप में जनता के सामने प्रकाशित एवं प्रसारित किया जा रहा है। अपने शब्दों में देवभूमि समाचार से संबंधित अपनी टिप्पणी दें एवं 1, 2, 3, 4, 5 स्टार से रैंकिंग करें।

सवालों में ऐसे उलझ गया आफताब, एक तो घर से लाश की बू निकालनी थी, दूसरी मैं ये यकीन कर लेना चाहता था कि घर के अंदर खून या मांस के कोई भी सबूत ना छूट जाए. मैं जानता था

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Devbhoomi Samachar