- शब्द ही मेरी पूंजी हैं, शब्द ही मेरे मित्र हैं
- साहित्य सृजन मेरी साधना और आत्मा की आवाज है
- पाठकों की प्रतिक्रिया ही मेरा पारिश्रमिक है
- शब्दों की मिठास से संबंधों को मजबूत बनाइए
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान
मैं जो देखता हूं, वही तो लिखता हूं। चूंकि मैं सदैव मन की बात लिखता हूं, क्योंकि लेखन ही मेरा जीवन है। यही वजह है कि मुझे शब्दों से बेहद प्यार है। शब्द ही मेरी पूंजी हैं। शब्द ही मेरे मित्र हैं। शब्द ही सुख-दुःख के साथ हैं। शब्दों के बिना मेरा जीवन नीरस है। मैं कोई मुंशी प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, शिवमंगल सिंह सुमन, हरिशंकर परसाई तो हूं नहीं और न ही उनके जैसा बन सकता हूं, लेकिन प्रयास करना मेरा धर्म है, मेरी साधना है। सत्य लिखो, सत्य पढ़ो और आगे बढ़ो।
मैं कोई बड़ा साहित्य सृजनकर्ता नहीं हूं। बस मैं तो अपने मन की बात लिखता हूं। अच्छी लगे तो उसे अंगीकार कर जीवन में आत्मसात कीजिए और बेकार की बकवास लगे तो मुझे सूचित करें। मैं तो बस दिन-रात चिंतन-मनन करके सकारात्मक सोच के साथ अपने मन की व्यथा लिखता हूं। मैं कोई शब्दों का खिलाड़ी नहीं हूं, फिर भी शब्दों से प्यार करता हूं। शब्दों को एक माला के रूप में पिरोता हूं और फिर उस लेखनी को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता हूं। यही मेरी रुचि है। चिंतन-मनन है। शब्दों के प्रति प्यार व स्नेह है। पाठकों का स्वच्छ मनोरंजन करना मेरा मानवीय धर्म है। पाठकों की प्रतिक्रिया ही मेरा पारिश्रमिक है। मेरी धन-संपदा है। न जाने कब इस जीवन की लौ थम जाए और मैं यह नश्वर संसार छोड़कर परलोक सिधार जाऊं।
लेकिन मेरे पाठक, रचनाधर्मी, मेरे साहित्य प्रेमी इस लेखनी के कारण मुझे निरंतर स्मरण करते रहेंगे। मेरा लेखन स्वतंत्र, स्वच्छ व निर्बाध है। इसमें शालीनता, सच्चाई व खरी-खरी बातें हैं। जीवन का सार है। जैसा मैंने देखा, परखा, समझा, वैसा ही लिखा और पाठकों के समक्ष पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ परोसा। संपादक मंडल ने सदैव मेरी लेखनी को धार दी। सजाया व संवारा, जिससे मेरी लेखनी में चार चांद लग गए और मेरी साहित्य सृजन यात्रा अमर हो गई।
साहित्य सृजन मेरा धर्म है। मेरी आत्मा की आवाज है। शब्दों के प्रति मेरा प्यार व स्नेह है। यह मेरे मन की बात है। इस लेखनी की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब पाठकगण इस साहित्य साधना को संजोए रखेंगे। जहां कलम निष्पक्षता के साथ निर्बाध रूप से चलती है, उस कलमकार की कलम पर मां सरस्वती का आशीर्वाद बना रहता है। अतः शब्दों को कभी भी तोड़-मरोड़कर न पेश करें, अपितु उनके साथ भी शालीनतापूर्वक व्यवहार कीजिए। शब्दों की मिठास ही हमारे संबंधों को मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध होती है, अन्यथा संबंध बिगड़ते देर नहीं लगती है। न जाने कब एक कटु शब्द ही प्रगाढ़ रिश्तों को एक पल में ही कांच की तरह चूर-चूर कर दे। इसलिए शब्दों को प्यार से इस्तेमाल कीजिए और जीवन को खुशहाल बनाइए।
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