- भारतीय संस्कृति में मेंहदी का महत्व
- मेंहदी के रंग में रचे सौंदर्य और परंपरा के रंग
- सुहाग, प्रेम और शुभता का प्रतीक है मेंहदी
- मेंहदी की परंपरा और बदलते दौर की कहानी
सुनील कुमार माथुर
हिंदू संस्कृति में मेंहदी का बड़ा ही महत्व है। भारतीय संस्कृति में बिना मेंहदी के कोई-सा भी तीज-त्योहार व मांगलिक कार्य संपन्न नहीं होता है। नारी जैसे गहने व शानदार कपड़े पहनकर सजती-सँवरती है, तब भी बिना मेंहदी लगाए उसे सूनापन महसूस होता है। मेंहदी लगाने से जिस आत्मसंतुष्टि की प्राप्ति होती है, उसे वही जानती है। हमारे संवाददाता सुनील कुमार माथुर को एक साक्षात्कार में श्रीमती परिणा माथुर ने बताया कि मेंहदी सुहाग का प्रतीक है व सोलह श्रृंगार में से एक श्रृंगार यह भी है। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के कुछ चुनिंदा अंश।
माथुर — क्या मेंहदी सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक है?
परिणा — जी हाँ, यह सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक है। समय के साथ-साथ मेंहदी भारतीय संस्कृति और हिंदू शादियों तथा त्योहारों (जैसे करवा चौथ, तीज और दिवाली) का अभिन्न हिस्सा बन गई। इसे सुहाग, प्रेम, सकारात्मकता और शुभता (शुभ कार्यों) का प्रतीक माना जाता है। अगर ऐसे वक्त लड़कियाँ और महिलाएँ मेंहदी न लगाएँ, तो उन्हें अजीब-सा लगता है।
माथुर — मेंहदी की तासीर कैसी होती है?
परिणा — शीतलता और स्वास्थ्य की दृष्टि से रेगिस्तानी इलाकों (जैसे अरब और भारत के कुछ हिस्सों) में मेंहदी की तासीर ठंडी होने के कारण लोग शरीर का तापमान कम रखने और गर्मी से बचने के लिए हाथों-पैरों पर इसका लेप लगाते थे। भारत में मेंहदी का सबसे ज्यादा उपयोग महिलाएँ और लड़कियाँ करती हैं, विशेषकर शादियों, त्योहारों (जैसे करवा चौथ, तीज, दीपावली, ईद) और अन्य मांगलिक अवसरों पर।
माथुर — क्या मेंहदी दुल्हन का श्रृंगार है?
परिणा — जी हाँ। मेंहदी शादी में दुल्हन का सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार माना जाता है। विवाह के समय दुल्हन और उसके परिवार की महिलाएँ हाथों और पैरों पर बड़े पैमाने पर मेंहदी लगाती हैं। मेंहदी लगाने में समय भी लगता है, लेकिन यह समय परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत में निकल जाता है। अगर दूसरे शब्दों में कहें, तो मेंहदी के मांडने नारी की कार्यकुशलता को दर्शाते हैं।
माथुर — क्या मेंहदी लगाना शुभ माना जाता है?
परिणा — भारत के विभिन्न राज्यों, जैसे राजस्थान, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश में हर सुहागिन स्त्री के लिए त्योहारों पर मेंहदी लगाना अनिवार्य और शुभ माना जाता है। मेंहदी से खुशियाँ बढ़ जाती हैं। उसकी डिजाइन बताती है कि भारतीय नारी कितनी प्रतिभाशाली है। दुल्हन के मेंहदी लगाते समय डिजाइन में उसके होने वाले पति के नाम का पहला अक्षर भी अंकित कर दिया जाता है, जो प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
माथुर — किसी के हाथ-पैरों में मेंहदी हल्की होती है, तो किसी के गहरे रंग की। ऐसा क्यों?
परिणा — मेंहदी का गहरा और पक्का रंग पाने के लिए पेस्ट बनाते समय उसमें नींबू का रस, चीनी, चायपत्ती का पानी या कॉफी और कुछ बूँदें लौंग या नीलगिरी (यूकेलिप्टस) के तेल की मिलानी चाहिए। लेकिन आज के समय में महिलाएँ कटोरी में मेंहदी नहीं घोलती हैं, अपितु बाजार में बिकने वाले कोन का इस्तेमाल करती हैं। अनेक कंपनियाँ हल्की क्वालिटी की मेंहदी बेच रही हैं, जो मात्र दो-तीन दिन में ही साफ हो जाती हैं, जबकि कटोरी में भिगोकर माचिस की तीली से लगाई जाने वाली मेंहदी की होड़ कोन वाली मेंहदी नहीं कर सकती है।
माथुर — क्या आप बता सकती हैं कि मेंहदी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
परिणा — मेंहदी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के प्राचीन शब्द ‘मेंधिका’ (Mendhika) से हुई है। इसके अलावा अरबी भाषा में इसे ‘हिना’ (Henna) कहा जाता है, जो इसके वैज्ञानिक नाम लॉसनिया इनर्मिस (Lawsonia inermis) के अरबी नाम पर आधारित है। प्राचीन ग्रंथों और इतिहास में इसे मुख्य रूप से ‘मेंधिका’ ही कहा गया है।
माथुर — मेंहदी का चलन कैसे आरंभ हुआ?
परिणा — भारत में मेंहदी का चलन प्राचीन परंपरा के अनुसार होता आ रहा है। मुगलों के आने से पहले भी मेंहदी (या प्राकृतिक रंग) का अस्तित्व था। हालाँकि, तब स्त्रियाँ पैरों में लाल रंग के लिए ‘आलता या महावर’ का अधिक उपयोग करती थीं। भारत में कलात्मक डिजाइनों के साथ मेंहदी लगाने की परंपरा को मुगल काल (विशेषकर जहाँगीर और नूरजहाँ के समय) में बहुत बढ़ावा मिला। शाही दरबारों से यह कला आम जनजीवन और भारतीय त्योहारों-शादियों का अहम हिस्सा बन गई। इतिहास में मेंहदी के सबसे पुराने प्रमाण मिस्र से मिलते हैं, जहाँ ममी और राजाओं (फराओ) के नाखूनों व बालों को रंगने के लिए इसका उपयोग होता था। यहाँ तक कि मिस्र की प्रसिद्ध रानी क्लियोपेट्रा भी अपने शरीर को सजाने के लिए इसका इस्तेमाल करती थीं। वैसे देखा जाए, तो मेंहदी लगाने का प्रचलन आज से 5,000 से 9,000 वर्ष पहले प्राचीन मिस्र, मध्य पूर्व और भारत जैसी सभ्यताओं में औषधीय, सौंदर्य और शीतलता पाने के लिए शुरू हुआ था।
माथुर — क्या मेंहदी के बारे में आप कुछ और जानकारी साझा करना चाहती हैं?
परिणा — जी, जी। पहले जयपुर, राजस्थान से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रदूत के रविवारीय अंक के साथ राष्ट्रदूत साप्ताहिक किताब भी आती थी, जिसमें मेंहदी की हर सप्ताह डिजाइनें प्रकाशित होती थीं। दैनिक समाचार पत्रों के रविवारीय अंक में भी मेंहदी की डिजाइन प्रकाशित हुआ करती थी, जिसका महिलाएँ संकलन करती थीं। लेकिन वर्तमान दौर में यह सब सपना हो गया है। अतः प्रकाशकों को चाहिए कि वे इस कला को धरोहर के रूप में संजोए रखते हुए उसका फिर से प्रकाशन आरंभ करें।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पालरोड, जोधपुर, राजस्थान



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