चीन-नेपाल सीमा के पास पिथौरागढ़ के गर्ब्यांग गांव में भारतीय सेना की पहल से टेंट आधारित इको होमस्टे और सामुदायिक सुविधाएं विकसित होने के बाद गांव में फिर से आबादी बढ़ने लगी है। कभी भूधंसाव और सुविधाओं के अभाव के कारण पलायन झेल चुके इस गांव में अब करीब 180 लोग रह रहे हैं और पर्यटन से रोजगार की संभावनाएं बढ़ रही हैं। कैलास मानसरोवर, आदि कैलास और ओम पर्वत यात्रा मार्ग से जुड़ाव के कारण होमस्टे और स्थानीय पर्यटन कारोबार को नई उम्मीद मिली है।
- सेना की पहल से गर्ब्यांग में बढ़ी रौनक
- टेंट होमस्टे से गर्ब्यांग में लौटी उम्मीद
- सीमा गांव गर्ब्यांग में शुरू हुआ रिवर्स पलायन
- आदि कैलास यात्रा से गर्ब्यांग को मिला रोजगार का सहारा
धारचूला/पिथौरागढ़। चीन और नेपाल सीमा के पास स्थित पिथौरागढ़ का गर्ब्यांग गांव एक बार फिर आबाद होने की दिशा में बढ़ रहा है। कभी अपनी समृद्धि और भव्य मकानों के कारण कुमाऊं का ‘छोटा विलायत’ कहलाने वाला यह गांव पिछले कई दशकों में भूधंसाव, काली नदी के कटाव और सुविधाओं की कमी के कारण पलायन की मार झेलता रहा। अब भारतीय सेना की पहल और सीमांत क्षेत्र में बढ़ती पर्यटन गतिविधियों से गांव में नई उम्मीद दिखाई दे रही है। गांव को दोबारा आबाद करने के प्रयासों के तहत भारतीय सेना ने यहां पक्के निर्माण के बजाय टेंट आधारित इको होमस्टे विकसित किए हैं। इन होमस्टे के संचालन की जिम्मेदारी स्थानीय ग्राम समिति को सौंपी गई है। इसके अलावा कालापानी क्षेत्र में भी होमस्टे तैयार कर ग्रामीणों को सौंपे गए हैं।
टेंट होमस्टे से बढ़ीं रोजगार की संभावनाएं
गर्ब्यांग में वर्तमान में करीब 10 होमस्टे संचालित हो रहे हैं। इनमें कुछ होमस्टे स्थानीय ग्रामीणों के भी हैं। टेंट आधारित आवास की सुविधा शुरू होने से यहां आने वाले पर्यटकों और यात्रियों को ठहरने का विकल्प मिल रहा है, वहीं स्थानीय लोगों के लिए आय के नए अवसर भी बन रहे हैं। सेना की ओर से स्वरोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए गांव में एक सामुदायिक केंद्र और एक पॉलीहाउस भी तैयार कराया गया है। ग्रामीणों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर मेडिकल कैंप आयोजित किए जाते हैं। अन्य सामुदायिक गतिविधियों में भी ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
करीब 180 लोग अब गांव में रह रहे
कभी जनशून्य होने की स्थिति में पहुंच चुके गर्ब्यांग में अब करीब 180 लोगों के निवास करने की जानकारी सामने आई है। गांव तक सड़क सुविधा और सीमांत क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों के विस्तार ने भी यहां लौटने की उम्मीद को मजबूत किया है। कैलास मानसरोवर के साथ आदि कैलास और ओम पर्वत यात्रा मार्ग से जुड़े होने के कारण गर्ब्यांग में पर्यटन आधारित रोजगार की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से होमस्टे, स्थानीय परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े लोगों को भी काम मिलने की उम्मीद है।
1970 के बाद बढ़ती गई मुश्किलें
गर्ब्यांग के सामने मुश्किलें करीब 1970 के आसपास बढ़नी शुरू हुईं, जब गांव में बड़े पैमाने पर भूधंसाव होने लगा। काली नदी के कटाव ने भी गांव की जमीन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया। कई पुराने भव्य मकान तिरछे हो गए और खेतों को भी नुकसान पहुंचा। प्राकृतिक अस्थिरता के साथ सुविधाओं की कमी ने ग्रामीणों को अपने पुश्तैनी गांव से पलायन करने के लिए मजबूर किया। बड़ी संख्या में लोग हल्द्वानी, पिथौरागढ़ और तराई क्षेत्र के अन्य स्थानों में जाकर बस गए।
कभी भारत-तिब्बत व्यापार का प्रमुख केंद्र था
1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले गर्ब्यांग भारत-तिब्बत व्यापार का एक प्रमुख केंद्र माना जाता था। गांव में बड़ी संख्या में परिवार रहते थे और व्यापार के कारण यहां आर्थिक समृद्धि थी। पुराने नक्काशीदार तीन मंजिला मकान आज भी गांव के उस दौर की पहचान माने जाते हैं। उस समय गांव में 300 से अधिक परिवारों के रहने की जानकारी दी गई है। समृद्धि और आधुनिक जीवनशैली के कारण गर्ब्यांग को कुमाऊं का ‘छोटा विलायत’ कहा जाता था। अब सीमांत क्षेत्र में सड़क संपर्क, पर्यटन गतिविधियों और सेना की सामुदायिक पहल के साथ गर्ब्यांग में एक बार फिर जीवन लौटने की तस्वीर दिखाई दे रही है। टेंट होमस्टे, स्थानीय रोजगार और आदि कैलास-ओम पर्वत यात्रा से जुड़ी गतिविधियां गांव के लिए भविष्य में आय के महत्वपूर्ण साधन बन सकती हैं।

