लघुकथा ‘वंश’ में एक सरकारी अस्पताल में पोती के जन्म पर दादी की निराशा के माध्यम से पुत्र-मोह और पितृसत्तात्मक सोच को उजागर किया गया है। चौथी बेटी के जन्म पर दादी का दुख इस मानसिकता को सामने लाता है कि वंश आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल बेटे की है। बेहद संक्षिप्त कथा के जरिए बेटियों के प्रति समाज की सोच पर गंभीर सवाल उठाया गया है।
- वंश की चिंता
- चौथी बेटी
- बेटी के जन्म पर मायूसी
- वंश किससे चलता है?
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
सरकारी अस्पताल के बरामदे में करीब साठ-पैंसठ साल की एक बुढ़िया बड़ी ही बेचैनी से टहल रही थी, पर उसका सारा ध्यान प्रसव गृह के दरवाजे की तरफ ही था। भीतर से जब भी प्रसूता की चीख सुनाई देती तो वह बुढ़िया बड़बड़ाने लगती।
तभी प्रसव गृह का दरवाजा खुला। एक नर्स बाहर आई। मुस्कुराते हुए बोली- ‘दादी जी, बधाई हो, लड़की हुई है।’
‘लड़की हुई है’…. कहते हुए बुढ़िया का चेहरा उतर गया। बुढ़िया पास में पड़ी बेंच पर बैठ गई। तभी उसका लड़का आ गया, जो बाजार गया था, कुछ जरूरी सामान लेने।
अपनी मां को मायूस बैठा देख वह समझ गया कि इस बार भी लड़की हुई है। तभी बुढ़िया बुदबुदाई- ‘बेटा, इस बार भी वंश आगे न बढ़ पाया। यह चौथी कलमुंही पैदा हो गई…।’
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाकघर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश 283111 | 9627912535


