
साहित्यकार सुनील की लेखन के प्रति गहरी रुचि और श्रेष्ठ साहित्य सृजन के प्रति समर्पण की कहानी है। उनके निधन के बाद उनकी स्मृति में वाचनालय की स्थापना होती है, जो आज भी साहित्य प्रेमियों के लिए ज्ञान और साहित्य का केंद्र बना हुआ है। यह कहानी साहित्य को शब्दों की सुन्दर माला पिरोने वाली कला और साहित्यिक धरोहर की रक्षा का संदेश देती है।
- शब्दों की सुन्दर माला
- साहित्य की अमर धरोहर
- सुनील की साहित्य साधना
- स्मृतियों में जीवित साहित्यकार
सुनील कुमार माथुर
सुनील की श्रेष्ठ साहित्य सृजन में गहन रुचि थी। वह आए दिन आलेख लिखा करता था और उसके आलेख हर रोज स्थानीय, प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ करते थे। सुनील के पिता भी अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में कानून संबंधी आलेख लिखा करते थे (जो एक जाने-माने अधिवक्ता थे)। सुनील को उन्हीं से श्रेष्ठ साहित्य सृजन की प्रेरणा मिली थी।
सुनील ने अपने स्कूली जीवन से ही पढ़ाई के साथ ही साथ लेखन का कार्य आरम्भ कर दिया था। वह राजनीति व स्वास्थ्य को छोड़कर बाकी सभी विषयों पर नियमित रूप से लिखने में सदैव तत्पर रहता। यही वजह है कि उसे अनेक सामाजिक संस्थाओं व संगठनों ने समय-समय पर सम्मानित किया। सुनील के लिखे आलेख पाठक तत्परता के साथ पढ़ते थे और उन पर अपनी पैनी लेखनी से टिप्पणियां भी किया करते थे।
पाठकों की टिप्पणियां सुनील के लिए एक सच्चा मार्गदर्शन होता था। उसने कभी भी लेखन को अपनी पेट भराई का जरिया नहीं बनाया, अपितु पाठकों के मनोरंजन के लिए हर रोज कुछ नया और पहले से बेहतर देने को तत्पर रहता। उसके पास शब्दों का अथाह भण्डार था। वहीं उसका कहना था कि श्रेष्ठ साहित्य सृजन भी अन्य कलाओं की तरह एक कला है। जैसे पुष्प विक्रेता तरह-तरह के फूलों को सुई और डोरी के माध्यम से पिरोकर एक सुन्दर माला बनाता है, ठीक उसी प्रकार एक साहित्यकार शब्दों को पिरोकर एक सुन्दर व प्रेरणादायक रचना का निर्माण करता है।
रविवार का दिन था। बड़े सवेरे ही साहित्यकार सुनील का निधन हो गया। उसके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई। समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, पता भी नहीं चलता। एक दिन परिवार के सदस्यों ने तय किया कि सुनील की अलमारी में रखी कहानी, कविताओं व अन्य विधाओं की पुस्तकें किसी स्कूल की लाइब्रेरी में दे दी जाएँ।
जब यह बात सुनील के मित्र कुंदन को पता चली तो उसने सुनील के परिजनों से सलाह-मशविरा किया और सुझाव दिया कि मकान के एक कमरे में सुनील की स्मृति में वाचनालय खोल दिया जाए। जहाँ सभी वर्ग के लोगों को साहित्य पढ़ने की अनुमति दी जाए, ताकि सुनील की याद भी ताजा बनी रहेगी और हर वर्ग का पाठक भी वाचनालय से लाभान्वित होगा। सभी को यह सुझाव पसंद आया और सुनील की स्मृति में वाचनालय की स्थापना हो गई।
स्थानीय साहित्यकारों ने भी अपनी पुस्तकों का विमोचन होने के पश्चात पुस्तक की दो प्रतियां वाचनालय में भेंट करनी आरम्भ कर दीं। इससे वाचनालय में नई-नई पुस्तकें भी आने लगीं और सुनील की स्मृति में स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों ने भी मासिक व दैनिक अखबार भी निशुल्क वाचनालय में भेजना आरम्भ कर दिए।
वाचनालय की दीवारों पर आज भी साहित्यकार सुनील के वे शब्द बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित हैं कि साहित्य सृजन न केवल शब्दों की माला ही है, अपितु साहित्य सृजन शब्दों को सुन्दर ढंग से माला के रूप में पिरोकर प्रस्तुत करने की एक कला है। बस इस साहित्य धरोहर की रक्षा करना हम सबका दायित्व है। आज प्रतिदिन सैकड़ों लोग इस वाचनालय में आकर लाभान्वित हो रहे हैं, जो साहित्यकार सुनील को सच्ची पुष्पांजलि ही कहा जा सकता है।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं, सदस्य अणुव्रत लेखक मंच, जोधपुर, राजस्थान








