
यह कविता जीवन के संघर्ष, निराशा और कठिन परिस्थितियों के बीच आशा, धैर्य और विश्वास बनाए रखने का संदेश देती है। पतझड़, अंधियारे और सूखी धरती के प्रतीकों के माध्यम से कवि बताता है कि हर कठिन दौर के बाद नई भोर, नए सपने और नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं।
- अंधियारे के बाद उजाला
- आशाओं की नई उड़ान
- विश्वास से खिलेगा मधुमास
- हर अंत में नई शुरुआत
डॉ. सत्यवान सौरभ
पतझड़ चाहे छीन ले, पत्तों का संसार।
फिर हर डाली पर खिले, नवजीवन के हार॥
सूनी राहें देखकर, मन मत करो उदास।
काँटों की इस राह पर, फूलों की भी आस॥
टूटे सपनों को मिले, फिर से नव-आकाश।
हिम्मत जिसके साथ हो, पूरी हो हर आस॥
बादल चाहे घेर लें, छिप जाए दिनमान।
थोड़ा धीरज रख जरा, फिर खिले आसमान॥
सूखी धरती पर कभी, बरसे सावन-धार।
बंजर मन में भी खिले, आशाओं के हार॥
जीवन में सुख-दुख सदा, आते-जाते साथ।
धीरज रखकर जो चले, मंजिल देती हाथ॥
गिरना कोई हार नहीं, समझ ये इम्तिहान।
ठोकर खाकर फिर उठो, यही जीत का गान॥
बीते कल को छोड़कर, देखो नया विहान।
जो खोया वह सीख है, आगे नई उड़ान॥
राह कठिन हो तो कभी, छोड़ो मत विश्वास।
अंधियारा जितना घना, उतना निकट प्रकाश॥
नई भोर का गीत है, मन में रख विश्वास।
पतझड़ के हर अंत में, जन्मे है मधुमास॥
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)
डॉ. सत्यवान सौरभ
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी), भिवानी,






