
यह लेख भारतीय संस्कृति और जीवन में गाय के धार्मिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक महत्व को रेखांकित करता है। इसमें गौसेवा, गौदूध, गोबर तथा गौ-आधारित उत्पादों के महत्व के साथ गाय को राष्ट्र और धर्म से जोड़कर देखा गया है।
- गाय का जीवन में विशेष महत्व
- गौसेवा से धर्म और राष्ट्र की रक्षा
- भारतीय संस्कृति में गाय का महत्व
- गाय हमारी संस्कृति की आधारशिला
सुनील कुमार माथुर
जिस घर में गाय होती है, उस घर में देवताओं का वास होता है। गाय हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। हमारा अस्तित्व गाय के कारण ही है। आज बच्चे बाहर की चीजें बहुत खा रहे हैं, जिसके कारण वे कम उम्र में ही परलोक सिधार रहे हैं। गाय का दूध अमृत के समान है। गायों की सेवा से ही धर्म बचेगा व राष्ट्र बचेगा। हमारे को जन्म देने वाली मां कुछ समय तक ही बच्चों को दूध पिलाती है और फिर छोड़ देती है, लेकिन गऊ माता जीवन भर दूध पिलाती है। गाय की विशेषता का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
आज हम नकली दूध पी रहे हैं, जिसके कारण हम में रोगों से लड़ने की क्षमता नहीं है। वहीं दूसरी ओर दवा लेने से भी ठीक नहीं हो पा रहे हैं। लोग गाय के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं और उसे आवारा पशु कह रहे हैं, जो गऊ माता का अपमान है। गऊ माता में करोड़ों देवताओं का वास है। गायें लक्ष्मी का मूल हैं। गाय के लिए सभी जातियां व धर्म समान हैं। उनके लिए सारी धरती एक है और यही वजह है कि गाय दूध देते समय कोई भेदभाव नहीं करती है।
गौ एवं गौ रक्षा हिन्दू धर्म का प्रधान अंग हैं। उसके दर्शन व स्पर्श से पवित्रता आती है। रोगों व पापों का नाश होता है। गौ सेवा का पुण्य फल कभी भी क्षीण नहीं होता है। गौ सेवा से सभी देवों व तीर्थों की सेवा का फल प्राप्त होता है और समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है। जो गौ रज का तिलक लगाता है, उसका सुयश फैलता है। गौ ग्रास अथवा गौ सेवा घर में सुख, शांति और समृद्धि लाती है।
गाय का सुगन मंगलकारी होता है। वह हमारी जीवन भर सेवा करती है, किन्तु मरने के बाद भी मनुष्य उसके चर्म, हड्डी, सींग आदि से लाभ उठाते हैं। गर्भाधान से लेकर दाह संस्कार तक ऐसा कोई भी संस्कार नहीं है, जिसमें गौ वस्तु की आवश्यकता न पड़ती हो। मरने पर वैतरणी नदी गौ की पूंछ पकड़ कर ही पार की जाती है।
भारतीय संस्कृति में गौ का महत्व गायत्री एवं गंगा से भी बढ़कर है। गायत्री की साधना कठिन है। गंगा के लिए कुछ त्याग करना है, किन्तु गौ का लाभ तो घर बैठे मिल जाता है। मुख्यतः तीन मां होती हैं—एक जन्म देने वाली, दूसरी धरती मां (मातृभूमि) व तीसरी गौ माता। जन्म देने वाली मां का पोषण भी गौ माता ही करती है। जहां गाय चरती है, रहती है, वहां सम्पूर्ण देव एवं तीर्थ विराजते हैं। वह साक्षात् गौ लोक (बैकुंठ) है।
गाय के दूध को पृथ्वी का अमृत कहा गया है। यह बुद्धि, बल, रक्त व नेत्र ज्योति वर्धक है। गाय से बढ़कर इस संसार में कोई भी पवित्र जीव नहीं है। धर्मपरायण भारत की पुण्यमय वसुंधरा में अनेक संत-महात्मा, ऋषि-मुनियों की पावन तपोभूमि है। अनेक महान विभूतियों, वरिष्ठजनों व पूजनीय व्यक्तियों को प्रणाम करना व उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना हमारी परम्परा है।
देव आराधना, देव पूजन, जप-तप, वंदन-नमन हमारी चिर पुरातन संस्कृति है। हमारी संस्कृति में गाय का बड़ा ही महत्व है। गाय के कंडों का धुआं करने से माता रानी की कृपा बनी रहती है। इसके गोबर से त्वचा के लिए उबटन, बाथ सोप बनाया जाता है व कई बीमारियों में फायदेमंद है। देशी गाय के कुबड़ में सूर्य एवं केतु नाड़ी विद्यमान है। देशी गाय के गोबर व घृत को जलाने से शत-प्रतिशत वातावरण की शुद्धि होती है।
इसके गोबर की खाद से मिट्टी की बनावट बेहतर होती है। इससे मिट्टी में जल धारण क्षमता बढ़ती है और मिट्टी का कटाव कम होता है। गोबर में मौजूद पोषक तत्व पौधों की वृद्धि में मदद करते हैं। गोबर में प्राकृतिक गुण होते हैं, जो हानिकारक कीटों को दूर रखते हैं। गोबर से बायोगैस, अगरबत्ती, दीए, गमला जैसी कई तरह के प्रोडक्ट्स बनाए जा सकते हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान





