
श्रेष्ठ साहित्य सृजन केवल लेखन नहीं, बल्कि चिंतन, मनन, अध्ययन और सकारात्मक सोच का परिणाम है। लेखक के अनुसार साहित्यकार समाज को नई दिशा देने के साथ-साथ समाज हित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मौलिक साहित्य को प्रोत्साहन और साहित्यकारों को उचित सम्मान व पारिश्रमिक मिलना आवश्यक है।
- श्रेष्ठ साहित्य सृजन के लिए चिंतन जरूरी
- साहित्यकार समाज का सजग प्रहरी
- मौलिक लेखन को मिले प्रोत्साहन
- साहित्य सृजन में लगन और निष्ठा जरूरी
सुनील कुमार माथुर, जोधपुर, राजस्थान
श्रेष्ठ साहित्य सृजन भी एक कला है जो जनमानस पर गहरी छाप छोड़ता है। साहित्य सृजनकर्ता की चिंतन-मनन की शक्ति और गहरी सोच समाज को एक नई दशा व दिशा देती है। चूंकि साहित्यकार समाज का सजग प्रहरी होने की वजह से दिन-रात समाज हित की सोचता है और अपनी लेखनी के जरिए अपने नवीनतम विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास करता है। श्रेष्ठ साहित्य सृजन में भले ही बड़े संसाधन और खर्च न हो, लेकिन कड़ी मेहनत और लगन के साथ ही साथ नवीन विचारों पर गहन चिंतन-मनन व अध्ययन की आवश्यकता होती है।
श्रेष्ठ साहित्य सृजन पाठकों को यह संदेश देता है कि सीमित संसाधनों से भी समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है। बस जरूरत है तो आपकी सकारात्मक सोच की। जब साहित्यकारों का शौक जुनून बन जाता है तो फिर उनकी दृष्टि हर क्षण लेखन की दृष्टि से घूमती-फिरती रहती है और अच्छा व बुरा सब देखते चलते हैं और उन्हें चिंतन-मनन के साथ मन व मस्तिष्क में ही श्रेष्ठ शब्दों के जाल में गूंथते रहते हैं और फिर एक माला के रूप में उसे कागज पर उकेर देते हैं। चूंकि वह भी एक शिल्पी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यकार को उसकी रचना प्रकाशित होने के साथ ही साथ प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए। लेकिन प्रायः यह देखा जा रहा है कि पाठक प्रकाशित रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करने से कतरा रहे हैं, जो उचित नहीं है। वहीं प्रकाशक साहित्यकार को उचित पारिश्रमिक दें। चूंकि आर्थिक सहयोग से ही श्रेष्ठ साहित्य सृजन की कला को निरन्तर आगे जारी रखा जा सकता है। इसी के साथ ही साथ समाजसेवी लोग, सामाजिक संस्थाएं व राज्य सरकार अपनी-अपनी ओर से हर वर्ष साहित्यकार लेखक सम्मेलनों का आयोजन करें और साहित्यकारों के ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था के साथ ही साथ उनको आने-जाने का व्यय दें, ताकि सम्मेलनों के जरिए नये विचारों का आदान-प्रदान हो सके, वहीं दूसरी ओर श्रेष्ठ साहित्य का सृजन भी निरन्तर जारी रह सके।
अफसोस इस बात का है कि आज के इस तकनीकी दौर में कई रचनाकार मौलिक रचनाओं का सृजन करने के बजाय पुरानी पत्र-पत्रिकाओं में से निकालकर लिख रहे हैं, जो एक चिंता की बात है। कहते हैं कि जब नीयत साफ हो, कार्य करने की लगन व निष्ठा हो और बुलंद इरादे हों तो आप शब्दों की सुंदर माला पिरोकर पाठकों को एक शानदार, ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक व जीवन उपयोगी साहित्य परोस कर उनका श्रेष्ठ मनोरंजन कर सकते हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान







