
नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूरी बनाकर सकारात्मक सोच बनाए रखना आवश्यक है। सफलता और असफलता को जीवन का हिस्सा मानते हुए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। साथ ही आलोचना को समझने, खान-पान में सावधानी बरतने और स्वास्थ्य को धन से अधिक महत्व देने की जरूरत है।
- सकारात्मक सोच से ही सफलता का मार्ग
- नकारात्मक लोगों से दूरी बनाना जरूरी
- आलोचना सुनें, गलतियों को सुधारें
- स्वास्थ्य की हिफाजत धन से भी अधिक जरूरी
सुनील कुमार माथुर, जोधपुर, राजस्थान
नकारात्मक लोगों से सदैव दूर रहना चाहिए क्योंकि उन्हें समाधान में भी समस्या ही नज़र आती है। हम प्रायः देखते हैं कि जिसकी सोच नकारात्मक होती है, वह हर वस्तु में केवल खामियां ही ढूंढ़ता फिरता है। उसके सामने कितनी भी सुंदर वस्तु क्यों न पड़ी हो, फिर भी वह येन-केन-प्रकारेण उसमें कोई न कोई कमी ढूंढ कर बताने का प्रयास करने लगता है। अतः हमें ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा वे हमारी सोच को भी नकारात्मक सोच में बदल देंगे और हमारी सकारात्मक सोच नकारात्मक सोच में परिवर्तित हो जायेगी, जो उचित नहीं है। हमें समय रहते ऐसे लोगों से दूरी बना लेनी चाहिए। अच्छी सोच और बनावटी अच्छी सोच में जमीन-आसमान का फर्क है।
कहते हैं कि सफलता कभी स्थायी नहीं होती और असफलता कभी अंतिम नहीं होती। सफलता हमें निरन्तर प्रगति की ओर ले जाती है, ताकि हम अपना निर्धारित लक्ष्य हासिल कर सकें। उसी तरह असफलता कभी भी अंतिम नहीं होती, अपितु वह हमें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का एक और सुनहरा अवसर प्रदान करती है। अतः असफलता को लेकर हमें हताश व निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि और भी अधिक लगन व मेहनत के साथ फिर से प्रयास शुरू करने चाहिए और अपनी गलती को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। सफलता अवश्य ही हासिल होगी।
प्रायः देखा गया है कि लोग दूसरों की आलोचना धड़ल्ले से करते हैं और जमकर दूसरों का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन अपनी आलोचना सुनने को तनिक भी तैयार नहीं रहते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि अपनी आलोचना को धैर्य से सुनें। यह हमारी ज़िन्दगी का मैल हटाने में साबुन का काम करती है। याद रखिए कि न तो कभी किसी की आलोचना करें और न ही कभी किसी की आलोचना सुनें। चूंकि ज्यों ही आप वहां से रवाना होंगे कि लोग आपकी आलोचना शुरू कर देंगे। सबके साथ मधुर संबंध बनाये रखें, ताकि कोई भी किसी की आलोचना न करे।
वर्तमान समय में लोग बाजार का बना-बनाया खाना खाते हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं है। क्योंकि उसमें तनिक भी शुद्धता का ख्याल नहीं रखा जाता है। सड़ा-गला सब पका दिया जाता है और वह गर्मागर्म होने से व चटपटा होने से हम उसे खा लेते हैं और बाद में यही भोजन अस्वस्थ कर देता है। हम दूसरों की देखा-देखी बाजार से भोजन मंगा कर खाते रहते हैं और अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बेकार में ही धन की अनावश्यक रूप से बर्बादी भी कर रहे हैं। चूंकि जिस रेट में हम वह खाद्य सामग्री खरीद रहे हैं, वह लागत मूल्य से कई गुणा अधिक होती है और हम दूसरों की देखा-देखी व अपने चटोरेपन के आगे कड़ी मेहनत से कमाये गये धन की अनदेखी कर अपने ही धन से अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। यह कैसी विडम्बना है। किसी महापुरुष ने ठीक ही कहा है कि शरीर की हिफाजत धन से भी अधिक करनी चाहिए, क्योंकि शरीर बिगड़ने के बाद धन भी उसकी हिफाजत नहीं कर सकता है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान







