
मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों को पारंपरिक खेलों, बाल साहित्य और प्रकृति से दूर कर दिया है। लेख में बदलते समय के साथ लुप्त होते खेलों और वाचनालयों पर चिंता जताते हुए बच्चों को मोबाइल के बजाय शिक्षा और बाल साहित्य से जोड़ने की जरूरत बताई गई है।
- मोबाइल ने छीने बचपन के पारंपरिक खेल
- मोबाइल की लत से दूर हो रहा बचपन
- कहां खो गए गली-मोहल्लों के खेल और वाचनालय
- बचपन बचाना है तो मोबाइल से दूरी जरूरी
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान
इस तकनीकी युग में हर हाथ में मोबाइल थमा हुआ है और हर आंख मोबाइल पर गड़ी हुई है। ऐसा लगता है कि मोबाइल ही सब कुछ है। यहीं हमारे मां-बाप हैं। तभी तो देर रात तक लोग मोबाइल चलाते रहते हैं और नींद में से उठते ही पहले मोबाइल को संभालते हैं। इसके बावजूद भी वे स्वयं मोबाइल से दूरी बनाए रखने की सलाह हर किसी को दे रहे हैं। यह कैसी विडम्बना है।
जो बच्चे पहले गली-मोहल्ले में जाकर कबड्डी, संतोलिया, कंचे, क्रिकेट, चर-भर, माचिस की छाप के खेल, छुपा-छिपी, चौपड़, गीली मिट्टी में पांव डालकर घर बनाना, गलेल खेलना, अंगुलियों में डोरी डालकर चोर को पकड़ना, रबर में बटन डालकर उसे तार से बांधकर बच्चों को डराना, लट्टू चलाना, बरसात में स्नान करते हुए ‘मेहबाबा आ जा, दूध रोटी खा जा’ गला फाड़-फाड़कर चिल्लाया करते थे और पंडालों (छत की मोरी) के नीचे स्नान किया करते थे, मोहल्ले के वाचनालय में जाकर बाल साहित्य की पुस्तकें पढ़ा करते थे। वह सब बातें एक स्वप्न-सी हो गई हैं।
आज गली-मोहल्ले में खेलने को मैदान नहीं रहे। वहां बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बन गई हैं। पगडंडियां साफ हो गई हैं। बरसात का कोई भरोसा नहीं, अब घर के बाथरूम के फव्वारे के नीचे स्नान कर वर्षा का आनंद लीजिए। वाचनालय बंद हो गए हैं, चूंकि पत्र-पत्रिकाओं के लिए समय पर बजट नहीं मिल रहा है। आज आधुनिकता के नाम पर हर हाथ में मोबाइल है। आज ये सारी बातें लुप्त-सी हो गई हैं। इन खेलों से रचनात्मकता के साथ ही साथ कल्पना शक्ति भी बढ़ती थी, लेकिन आज के बच्चे इन बातों को मजाक-सा समझते हैं। चूंकि हर हाथ में मोबाइल है।
ये तमाम खेल हमारी एकता के प्रतीक हैं, जो हमें साथ रहने की प्रेरणा देते हैं। सकारात्मक सोच व कल्पना शक्ति को विकसित करने वाले हैं। लेकिन मोबाइल रूपी इस खिलौने ने सारे खेलों को ताक पर रख दिया। जिन वृक्षों की छांव में हम खाट डालकर ठंडी-ठंडी हवा का आनंद लिया करते थे, सावन माह में झूला झूला करते थे, वे आज विकास के नाम पर काट दिए गए। नतीजन आज भीषण गर्मी में जी रहे हैं। यह कैसा विकास, जहां प्रकृति से मिली सुविधाओं को भी हम मिटा रहे हैं और फिर उसके भयानक परिणामों को भुगत रहे हैं।
बच्चों को मोबाइल नहीं, शिक्षा की पाठ्य पुस्तकों और बाल साहित्य से जोड़िए। तभी उनका सर्वांगीण विकास संभव हो पाएगा, अन्यथा मोबाइल की लत के चलते वे हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भी भूल जाएंगे। इसके लिए पहल अपने से व अपने घर से ही करनी होगी, फिर कारवां स्वतः चल पड़ेगा।





