
अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और प्रसिद्ध कोच जसपाल राणा के निधन से खेल जगत और उत्तराखंड शोक में डूबा है। शनिवार को उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए देहरादून स्थित आवास पर रखा जाएगा, जिसके बाद वाराणसी में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन पर खेल, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र की अनेक हस्तियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है।
- गांव से देहरादून तक शोक की लहर, आज पंचतत्व में विलीन होंगे जसपाल राणा
- देश को चैंपियन देने वाले कोच को अंतिम सलाम, वाराणसी में होगा दाह संस्कार
- गरीब बच्चों के मार्गदर्शक थे जसपाल राणा, खेल जगत ने नम आंखों से दी श्रद्धांजलि
- विश्व मंच पर भारत का मान बढ़ाने वाले निशानेबाज को आज अंतिम विदाई
देहरादून। भारतीय निशानेबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और प्रतिष्ठित कोच जसपाल राणा को शनिवार को अंतिम विदाई दी जाएगी। उनके निधन की खबर से खेल जगत, उत्तराखंड और उनके पैतृक क्षेत्र में शोक की लहर है। उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए देहरादून स्थित आवास पर रखा जाएगा, जहां खेल प्रेमी, प्रशंसक, खिलाड़ी और विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियां उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी। इसके बाद अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर वाराणसी ले जाया जाएगा। 50 वर्षीय जसपाल राणा के आकस्मिक निधन ने देशभर के खेल समुदाय को स्तब्ध कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को गौरवान्वित करने वाले राणा केवल एक सफल निशानेबाज ही नहीं थे, बल्कि नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक भी थे। उनके निधन की सूचना मिलते ही उनके पैतृक गांव टटोर, नैनबाग, चिलामू और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर फैल गई। बड़ी संख्या में ग्रामीण और खेल प्रेमी अंतिम दर्शन के लिए देहरादून रवाना हुए। राणा के करीबी मित्रों ने बताया कि वह अत्यंत सरल, मिलनसार और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व के धनी थे। व्यस्त कार्यक्रमों के बावजूद वह अपने गांव और क्षेत्र से लगातार जुड़े रहते थे। कुछ माह पूर्व गांव आगमन के दौरान भी उन्होंने स्थानीय लोगों से आत्मीय मुलाकात की थी। उनके मित्रों के अनुसार खेलों के प्रति उनका समर्पण और युवाओं को आगे बढ़ाने का जज्बा उन्हें दूसरों से अलग बनाता था।
जसपाल राणा का जन्म उत्तरकाशी जिले में हुआ था, जहां उनके पिता नारायण सिंह राणा की तैनाती भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने मसूरी और दिल्ली में अध्ययन किया। दिल्ली में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने निशानेबाजी में रुचि विकसित की और बाद में इसी क्षेत्र में देश का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोशन किया। खेल उपलब्धियों के साथ-साथ कोच के रूप में भी उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। वर्ष 2012 के बाद उन्होंने युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने का जिम्मा संभाला। देहरादून स्थित शूटिंग रेंज में वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को निशुल्क प्रशिक्षण उपलब्ध कराते थे। उनके प्रयासों से अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। यही कारण है कि उनके निधन को केवल एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और प्रेरक व्यक्तित्व की क्षति माना जा रहा है।
जसपाल राणा एक ऐसे परिवार से आते थे, जिसका खेलों से गहरा जुड़ाव रहा है। पूर्व खेल राज्य मंत्री नारायण सिंह राणा के तीन बच्चों में वह सबसे बड़े थे। उनके छोटे भाई सुभाष राणा भी अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और कोच हैं, जबकि बहन सुषमा राणा भी निशानेबाजी से जुड़ी रही हैं। उनकी बेटी देवांशी राणा ने भी विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर परिवार की खेल विरासत को आगे बढ़ाया है। पुत्र युवराज राणा भी निशानेबाजी के क्षेत्र में अपना करियर बना रहे हैं।
उनके निधन पर विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और खेल संगठनों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। जनप्रतिनिधियों, खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों ने इसे उत्तराखंड और देश के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। श्रद्धांजलि संदेशों में लोगों ने उनके योगदान, सादगी और खेलों के प्रति समर्पण को याद किया। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित करने वाले इस महान निशानेबाज और कोच की अंतिम यात्रा आज भावुक माहौल में निकलेगी। खेल जगत उन्हें केवल उनकी उपलब्धियों के लिए ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को दिशा देने वाले एक समर्पित गुरु के रूप में भी हमेशा याद रखेगा।





