
खेजड़ी थार मरुस्थल का ऐसा कल्पवृक्ष है जो भीषण गर्मी, सूखे और कठिन परिस्थितियों में भी जीवन का आधार बना रहता है। धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण यह वृक्ष राजस्थान की संस्कृति और लोकजीवन का अभिन्न अंग है। खेजड़ली के 363 बलिदानों ने इसे प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण चेतना का अमर प्रतीक बना दिया है।
- खेजड़ी: मरुस्थल की जीवनरेखा और पर्यावरण का प्रहरी
- शमी से खेजड़ी तक: आस्था, विज्ञान और बलिदान की कहानी
- थार का गौरव खेजड़ी: संस्कृति, प्रकृति और संरक्षण का प्रतीक
- 363 बलिदानों की साक्षी खेजड़ी: दुनिया के पहले पर्यावरण आंदोलन की विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
हमारे देश की संस्कृति में वृक्षों को केवल वनस्पति नहीं, बल्कि देवताओं का रूप, जीवन का रक्षक और इतिहास का गवाह माना गया है। इसी गौरवमयी परंपरा का सबसे जीवंत और अद्भुत उदाहरण है—खेजड़ी। रेगिस्तान की भीषण और झुलसा देने वाली 50 डिग्री सेल्सियस की लू, पानी की भयंकर कमी और चारों ओर पसरे सूखे के बीच भी जो वृक्ष सदियों से मुस्कुराते हुए हरा-भरा खड़ा है, वह खेजड़ी ही है। राजस्थान के थार मरुस्थल में इसे सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि वहाँ के जनजीवन, पशुधन और पर्यावरण की ‘जीवनरेखा’ माना जाता है। यही कारण है कि इसे लोकभाषा में ‘मरुस्थल का कल्पवृक्ष’ या ‘थार का गौरव’ कहा जाता है। इसके इसी अदम्य साहस, उपयोगिता और महत्ता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने वर्ष 1983 में इसे ‘राज्य वृक्ष’ घोषित कर एक विशिष्ट सम्मान प्रदान किया।
खेजड़ी का वैज्ञानिक या वानस्पतिक नाम प्रोसोपिस सिनेरेरिया है। अंग्रेजी भाषा और व्यापारिक जगत में भी यह इसी नाम से जाना जाता है। यद्यपि यह मुख्य रूप से थार के मरुस्थल की पहचान है, परंतु यह भारत के विभिन्न राज्यों तथा दुनिया के कई अन्य देशों में भी पाया जाता है, जहाँ इसे अलग-अलग सुंदर स्थानीय नामों से पुकारा जाता है—
राजस्थान: जांटी, जांट या सांगरी
उत्तर प्रदेश: छोंकरा
बिहार: सम्मी
पंजाब: जंड
सिंध (पाकिस्तान): कांडी (इसका व्यापारिक नाम भी कांडी ही है)
गुजरात: शमी या सुमरी
तमिलनाडु: वण्णि
संयुक्त अरब अमीरात: घफ़ (यूएई में भी इसे अत्यंत पवित्र और राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है)
खेजड़ी का इतिहास और धार्मिक महत्व अत्यंत प्राचीन है। सनातन धर्म में इसे ‘शमी का वृक्ष’ कहा गया है। यह पेड़ भारतीय इतिहास के कई युगों और महान चरित्रों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
भगवान शिव, शनि और गणेश जी का प्रिय
शमी का वृक्ष त्रिदेवों और नवग्रहों से संबंध रखता है। यह देवों के देव महादेव (भगवान शिव), विघ्नहर्ता श्री गणेश और न्याय के देवता शनि देव को अत्यंत प्रिय है। ऐसी मान्यता है कि इसकी पत्तियों को शिव जी और गणेश जी पर अर्पित करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं। वहीं, शनिवार के दिन शमी के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के कुप्रभावों से मुक्ति मिलती है। वैदिक काल से ही यज्ञ और अनुष्ठानों में शमी की लकड़ी का बड़ा महत्व रहा है। शास्त्रों के अनुसार, वसंत ऋतु में होने वाले यज्ञों में समिधा (हवन की लकड़ी) के रूप में शमी की लकड़ी का ही प्रावधान किया गया है। विशेष रूप से शनिवार के दिन शमी की समिधा से हवन करने का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।
अयोध्या के राजा महाराज दशरथ ने पुत्र प्राप्ति की कामना के लिए जो पुत्रेष्टि यज्ञ और आराधना की थी, उसमें भी उन्होंने शमी वृक्ष की विशेष पूजा-अर्चना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें प्रभु श्रीराम सहित चार दिव्य पुत्र रत्न प्राप्त हुए। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन से भी खेजड़ी (शमी) का गहरा नाता है। लंका युद्ध के समय, रावण की सेना पर अंतिम और निर्णायक आक्रमण करने से पूर्व भगवान राम ने इसी पावन शमी वृक्ष की विशेष पूजा की थी और विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया था। यही कारण है कि आज भी हर साल विजयदशमी (दशहरा) के पावन पर्व पर पूरे भारत में, विशेषकर राजस्थान में, खेजड़ी वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है।
महाभारत काल में जब पांडवों को बारह वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास काटना था, तब उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए इसी खेजड़ी वृक्ष को चुना था। अर्जुन ने अपना महाविनाशक ‘गांडीव धनुष’ और अन्य पांडवों ने अपने हथियार इसी पेड़ के एक खोखले तने के भीतर छिपा दिए थे और भेष बदलकर राजा विराट के महल में रहने चले गए थे। पेड़ ने पूरे एक वर्ष तक उन शस्त्रों की रक्षा की थी। खेजड़ी केवल कथाओं में ही नहीं, बल्कि विज्ञान की दृष्टि से भी मरुस्थल के लिए एक महान वरदान है।
नाइट्रोजन का स्थिरीकरण: मरुस्थल की मिट्टी में पोषक तत्वों की भारी कमी होती है। ऐसे में खेजड़ी का पेड़ वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन को सोखकर अपनी जड़ों के माध्यम से भूमि के भीतर प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन यौगिकों का निर्माण करता है। इससे भूमि की उर्वरता कई गुना बढ़ जाती है, जिससे किसानों की फसलें बेहतर होती हैं। मिट्टी के कटाव और रेगिस्तान को बढ़ने से रोकना: रेगिस्तान में चलने वाली तीव्र हवाएँ और आँधियाँ मिट्टी को उड़ा ले जाती हैं, जिससे मरुस्थलीकरण बढ़ता है। खेजड़ी की गहरी और मजबूत जड़ें मिट्टी को कसकर बाँधे रखती हैं, जिससे भूमि का कटाव रुकता है और रेगिस्तान का फैलाव थम जाता है।
नमी का रक्षक: यह पेड़ जमीन के भीतर और आसपास नमी को बनाए रखता है, जिससे इसके साए में अन्य छोटी वनस्पतियाँ और फसलें भी जीवित रह पाती हैं। थार मरुस्थल के निवासियों और वहाँ के पशुओं के लिए खेजड़ी एक कल्पवृक्ष की तरह काम करता है, जिसका हर एक भाग उपयोगी है। खेजड़ी के पेड़ पर लगने वाली हरी फलियों को ‘सांगरी’ कहा जाता है। यह सांगरी प्रोटीन, खनिज और विटामिन से भरपूर होती है। राजस्थान में सांगरी की सब्जी, आचार और ‘केर-सांगरी’ का पंचकूटा व्यंजन बेहद लोकप्रिय और स्वादिष्ट माना जाता है। अकाल के समय में यह सांगरी मरुस्थल के लोगों के लिए मुख्य भोजन का सहारा बनती है। खेजड़ी की हरी और घनी पत्तियों को स्थानीय भाषा में ‘लूंग’ कहा जाता है। यह लूंग मरुस्थल के मूक पशुओं (विशेषकर बकरियों, भेड़ों और ऊँटों) के लिए अत्यंत पौष्टिक, सुपाच्य और प्रोटीनयुक्त चारा है। जब गर्मियों में सारा घास-फूस सूख जाता है, तब यही लूंग पशुओं को जीवन देती है।
दुनिया का पहला पर्यावरण आंदोलन
खेजड़ी का इतिहास केवल इसकी उपयोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव इतिहास के सबसे महान और भावुक कर देने वाले आत्मबलिदान का गवाह भी है। वर्ष 1730 ईस्वी में जोधपुर के खेजड़ली गाँव में एक अत्यंत हृदयविदारक और प्रेरणादायी घटना घटी। जोधपुर के महाराजा के महल निर्माण के लिए लकड़ी की आवश्यकता थी, जिसके लिए सैनिकों को खेजड़ली गाँव के खेजड़ी वृक्षों को काटने का आदेश दिया गया। जब सैनिक पेड़ काटने पहुँचे, तब पर्यावरण और पेड़ों को अपनी संतान मानने वाली एक वीर महिला अमृता देवी बिश्नोई इसके विरोध में खड़ी हो गईं।
उन्होंने नारा दिया था—”सिर साठे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण।”
(अर्थात यदि एक सिर कटवाने से भी एक पेड़ बच जाता है, तो उसे सस्ता सौदा समझना चाहिए।)
अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में बिश्नोई समाज के लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपट गए। सैनिकों ने क्रूरता दिखाते हुए पेड़ों के साथ-साथ इंसानों को भी काटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते 363 मासूम और प्रकृति-प्रेमी लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इतिहास में पर्यावरण की रक्षा के लिए हुआ यह अपनी तरह का पहला, अनूठा और सबसे बड़ा सामूहिक बलिदान था। इन 363 अमर शहीदों की पावन स्मृति में आज भी हर साल राजस्थान के जोधपुर जिले के खेजड़ली गाँव में भाद्रपद शुक्ल दशमी को एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। इसे ‘विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला’ कहा जाता है, जहाँ देश-विदेश से लोग आकर प्रकृति के प्रति अपना सम्मान और अगाध श्रद्धा प्रकट करते हैं।
आज के इस आधुनिक युग में जहाँ विकास और शहरीकरण के नाम पर अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं, वहीं खेजड़ी के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा है। मरुस्थल के पारिस्थितिकी तंत्र को टूटने से बचाने के लिए राजस्थान सरकार ने खेजड़ी की कटाई पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान किए हैं। विकास कार्यों के नाम पर भी इस पेड़ को काटना एक गंभीर और दंडनीय कानूनी अपराध है। खेजड़ी सिर्फ लकड़ी, पत्ती या फल देने वाला एक सामान्य पेड़ नहीं है; यह राजस्थान की गौरवशाली संस्कृति, ऐतिहासिक त्याग, धार्मिक आस्था और पर्यावरण संतुलन का जीता-जागता प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि विषम से विषम परिस्थितियों में भी कैसे धैर्य के साथ हरा-भरा रहा जाता है और दूसरों के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व कैसे समर्पित किया जाता है। थार के इस कल्पवृक्ष को बचाना, इसका रोपण करना और इसका संरक्षण करना हम सभी का न केवल नागरिक, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है।







