
उत्तराखंड में भर्ती अर्हता पूरी न करने वाले 69 शिक्षकों को हाईकोर्ट के अंतिम आदेश के बाद सेवा से हटा दिया गया है। ये शिक्षक विभिन्न जिलों में कार्यरत थे और उनकी नियुक्ति कोर्ट के फैसले के अधीन थी। विभाग ने बर्खास्त शिक्षकों को जनगणना ड्यूटी से भी मुक्त कर दिया है और इसे नियमों के अनुपालन की कार्रवाई बताया है।
- अर्हता पूरी न करने वाले शिक्षकों पर गिरी गाज
- हाईकोर्ट के फैसले के बाद शिक्षा विभाग की बड़ी कार्रवाई
- कई जिलों के 69 शिक्षक सेवा से बाहर, जनगणना ड्यूटी भी खत्म
- शिक्षक भर्ती विवाद का अंत, अयोग्य शिक्षकों की नौकरी गई
देहरादून: उत्तराखंड में शिक्षा विभाग ने बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए भर्ती अर्हता पूरी न करने वाले 69 शिक्षकों की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। यह कार्रवाई हाईकोर्ट के अंतिम आदेश के बाद की गई है, जिससे लंबे समय से चल रहे शिक्षक भर्ती विवाद पर विराम लग गया है। अपर शिक्षा निदेशक केएस रावत के अनुसार यह मामला वर्ष 2018-19 की शिक्षक भर्ती से जुड़ा है। उस समय निर्धारित नियमों के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक पद के लिए अभ्यर्थियों के पास बीएड की डिग्री और स्नातक में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक होना अनिवार्य था।
हालांकि कुछ अभ्यर्थी इन मानकों को पूरा नहीं कर पाए थे, फिर भी उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने उस समय शिक्षा विभाग को निर्देश दिया था कि इन अभ्यर्थियों के आवेदन स्वीकार किए जाएं, लेकिन उनकी नियुक्ति को अंतिम न्यायिक निर्णय के अधीन रखा जाए। अब हाईकोर्ट के अंतिम फैसले के बाद विभाग ने नियमों के अनुरूप कार्रवाई करते हुए सभी अयोग्य पाए गए शिक्षकों को सेवा से हटा दिया है। बर्खास्त किए गए शिक्षकों में रुद्रप्रयाग, ऊधमसिंह नगर, पौड़ी, पिथौरागढ़ और टिहरी सहित कई जिलों के शिक्षक शामिल हैं।
रुद्रप्रयाग जिले में ऐसे 10 शिक्षक थे, जबकि अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में शिक्षक प्रभावित हुए हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह कदम पूरी तरह न्यायालय के निर्देशों और भर्ती नियमों के अनुपालन में उठाया गया है। साथ ही, जिन शिक्षकों को सेवा से हटाया गया है, उन्हें जनगणना ड्यूटी से भी मुक्त कर दिया गया है। इस कार्रवाई को शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। विभाग का कहना है कि भविष्य में भर्ती प्रक्रिया को और अधिक सख्ती और स्पष्टता के साथ लागू किया जाएगा, ताकि इस तरह के विवादों की पुनरावृत्ति न हो।





