
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से पहले चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिसमें आचार संहिता उल्लंघन, वोटर लिस्ट में कटौती और चयन प्रक्रिया पर पक्षपात के आरोप शामिल हैं। लेख में दावा किया गया है कि आयोग की ‘चुनिंदा चुप्पी’ और कानूनी जवाबदेही से छूट ने लोकतंत्र में अविश्वास को बढ़ाया है। ऐसे में नतीजों की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न खड़े होने की बात कही गई है।
ओंकारेश्वर पांडेय
नई दिल्ली। कल यानी 4 मई 2026 को जब पांच राज्यों के वोटों की गिनती होगी, तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है। यह फैसला एक ‘नान-कमीशंड’ चुनाव आयोग का है। मत और जनादेश तो जनता ने दिया है, पर हार और जीत का फैसला ज्ञानेश कुमार का है। ममता बनर्जी की जीत हो या हिमंता बिस्वा सरमा की हार ही क्यों न हो, जब तक चुनाव आयोग पर शंका का लेशमात्र भी रहेगा, लोकतंत्र में विश्वास पर सवाल उठेंगे ही। विश्वास चाहिए तो एक दबाव और प्रभाव से मुक्त, कानूनी जांच की जिम्मेदारी से युक्त चुनाव आयोग दीजिए।
कल टीवी चैनलों पर जब पांच राज्यों (पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और मेघालय) के रुझान आएंगे, तो शोर केवल आंकड़ों का होगा। लेकिन असल सवाल उस संस्थागत गिरावट का है, जिसने इस चुनाव को ‘अविश्वास के साये’ में धकेल दिया है।
अविश्वास की जड़ें: आचार संहिता का उपहास
इस चुनाव में चुनाव आयोग की साख पर सबसे बड़ा प्रहार उसकी ‘चुनिंदा चुप्पी’ से हुआ है। आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन अब एक अपवाद नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के लिए एक नियम बन गया है।
- प्रधानमंत्री का टीवी लाइव संबोधन: 18 अप्रैल 2026 को चुनाव के बीचों-बीच प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन एक खतरनाक मिसाल है। सरकारी मंच का उपयोग करके विपक्षी दलों (TMC, DMK, कांग्रेस) पर तीखे हमले किए गए। जब पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने बराबरी के हक के लिए ‘एयरटाइम’ मांगा, तो आयोग ने चुप्पी साध ली। यह न केवल MCC के खंड VII(4) का उल्लंघन है, बल्कि लोकतंत्र के बुनियादी ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ की हत्या है।
- यूपी के पुलिस अधिकारी का वायरल वीडियो: पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी पर तैनात उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह स्थानीय विपक्षी नेताओं को खुलेआम धमकाते और पक्षपातपूर्ण भाषा का प्रयोग करते दिखे। इस गंभीर ‘कंडक्ट’ के बावजूद आयोग ने न तो उन्हें हटाया और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई की।
- खिलाफ सक्रियता बनाम अपनों पर नरमी: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को एक बयान पर 24 घंटे में नोटिस थमा दिया गया, लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बंगाल में सीधे ‘वित्तीय वादे’ करने और कार्ड बांटने पर आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया।
वोटर लिस्ट की ‘शुद्धि’ और नागरिकता का कानूनी पेंच
इन पांच राज्यों में सबसे बड़ा ‘खेल’ वोटर लिस्ट के साथ हुआ। चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक मर्यादाओं को लांघते हुए लाखों नाम काट दिए। अकेले बंगाल और असम में यह संख्या लाखों में है।
कानूनी सवाल: यदि आयोग इन्हें ‘विदेशी’ मानकर हटा रहा था, तो विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) की धारा 3 के तहत उन्हें गिरफ्तार कर निष्कासित क्यों नहीं किया गया? क्या वजह है कि अमेरिका दस्तावेज न होने पर भारतीयों को हथकड़ी लगाकर वापस भेज देता है, लेकिन हमारी सरकार उन लाखों ‘संदिग्धों’ को केवल ‘वोट’ देने से रोकती है, पर देश में रहने देती है? इसका सीधा अर्थ है कि मंशा ‘देश की सुरक्षा’ नहीं, बल्कि ‘चुनावी गणित’ को साधना था।
आजीवन इम्यूनिटी: अदालतों के हाथ बांधने का खेल
जनता में इतना अविश्वास क्यों है? इसका जवाब दिसंबर 2023 के CEC एक्ट के उस ‘काले प्रावधान’ में छिपा है, जिसे सरकार ने बहुत चतुराई से शामिल किया। सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को ‘आजीवन इम्यूनिटी’ दे दी है। इस कानून के तहत, चुनाव आयुक्तों द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान किए गए किसी भी कार्य या लिए गए निर्णय के खिलाफ अदालतें सुनवाई नहीं कर सकतीं।
यानी, यदि आयोग ने खुलेआम किसी दल का पक्ष लिया हो या लाखों वैध वोटरों का अधिकार छीना हो, तो भी नागरिक कोर्ट नहीं जा सकते। यह प्रावधान चुनाव आयोग को ‘जवाबदेही’ से मुक्त कर एक ‘संवैधानिक तानाशाह’ बना देता है। जब आयोग को पता है कि सुप्रीम कोर्ट भी उसके फैसलों पर उसे कठघरे में नहीं खड़ा कर सकता, तो वह निष्पक्ष क्यों होगा?
एकतरफा चयन प्रक्रिया
अविश्वास की एक और बड़ी वजह वह कानून है जिसने चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया। अब प्रधानमंत्री और उनके द्वारा मनोनीत एक मंत्री ही तय करते हैं कि चुनाव कौन कराएगा। जब निर्णायक चुनने वाली कमेटी में सरकार का 2:1 का बहुमत हो, तो ‘स्वतंत्रता’ शब्द केवल कागजों पर रह जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति इसी एकतरफा प्रक्रिया की उपज है।
निष्कर्ष: परिणाम की वैधता पर प्रश्नचिह्न
कल मतगणना के बाद चाहे कोई भी गुलाल उड़ाए, लेकिन यह सत्य नहीं बदलेगा कि यह चुनाव एक ‘प्रोटेक्टेड’ आयोग के साये में हुआ है।
Stop Saying — जीतते हैं, तो चुनाव आयोग पर सवाल नहीं उठाते
जीत और हार तो लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन प्रक्रिया की शुचिता उसका प्राण है। जब तक चुनाव आयोग को सरकारी चंगुल से मुक्त नहीं किया जाता, और जब तक अदालतों को इसके खिलाफ सुनवाई का अधिकार वापस नहीं मिलता, तब तक हर चुनाव परिणाम एक ‘दागदार जनादेश’ ही माना जाएगा। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में कल जो भी नतीजा आए, वह अविश्वास की उस गहरी खाई को नहीं भर पाएगा जो इस चुनाव चक्र में खोदी गई है।
(लेखक ओंकारेश्वर पांडेय दस बार के संपादक, 13 पुस्तकों के लेखक, संस्थापक ‘गोल्डन सिग्नेचर’ और चुनावी रणनीतिकार हैं।)








