
यह कविता गेहूं के अत्यधिक सेवन से बढ़ती बीमारियों पर चेतावनी देती है और पारंपरिक मिश्रित अनाज अपनाने की सलाह देती है। लेखक स्वस्थ जीवन के लिए खान-पान में बदलाव और पुराने भारतीय आहार की वापसी पर जोर देते हैं।
- सेहत के लिए बदलो थाली
- मिलेट्स की ओर लौटता भारत
- गेहूं से दूरी, स्वास्थ्य से दोस्ती
- परंपरागत अनाज का महत्व
सैनिक कवि
गणपत लाल उदय, अजमेर राजस्थान
आज से ही सब छोड़ दो यह गेहूं की रोटियां खाना,
नहीं तो यारो पहुंचा देगा यह सभी को सफाखाना।
खा-खाकर जिससे सब लोग आज बढ़ा रहे हैं तोंद,
जीना है तो गेहूं छोड़ दो, सब मानो हमारा कहना।।
मोटापा-डायबिटीज बढ़ रहा है, इससे हृदय के रोग,
आज मिक्स अनाज खाकर रहो आप सब निरोग।
मक्का, बाजरा, जौ, ज्वार और खाना है सबको चना,
कोदरा, रागी, सावां, कांगनी का लगाना है ये भोग।।
1980 के पहले-पहले आम भारतीय इसको खाते,
बेजड़ मिक्स अनाज खाकर सब मौज-मस्त रहते।
आम तौर पर गेहूं रोटी मेहमान आगमन पर बनाते,
लंबी दूरी पैदल चलकर सभी जरूरतें पूरी करते।।
स्वस्थ रहने जीवन जीने के किस्से बुजुर्गों से सुनते,
आ जाते कभी घर-दामाद तो पराठा इससे बनाते।
आज इस गेहूं की लोच ने सबको कर दिया बीमार,
खाया और देखा है हमने घर जौ की रोटी बनाते।।
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विलियम डेविस का कहना,
चौंकाने वाली बात है, जीने के लिए गेहूं छोड़ देना।
गेहूं त्यागने का प्रण कर रहे आज अमेरिका-यूरोप,
वाकई ये सही बात है, शुरुआत हो गया यह सेना।।









