
आंध्र प्रदेश की अराकू घाटी, जो कभी नक्सल प्रभाव के लिए जानी जाती थी, आज जैविक अरेबिका कॉफी उत्पादन के कारण अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुकी है। आदिवासी किसानों की मेहनत, केंद्र-राज्य सरकारों की सब्सिडी और आधुनिक तकनीक ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी है। अराकू की प्रीमियम कॉफी का लगभग 80 प्रतिशत निर्यात हो रहा है और इसे वैश्विक बाजार में विशेष स्थान मिल चुका है।
- अराकू की अरेबिका कॉफी का लंदन-फ्रांस तक सफर
- 2.58 लाख एकड़ में फैली कॉफी खेती से बदली तस्वीर
- सरकारी सब्सिडी से आधुनिकीकरण, आदिवासी किसानों को मजबूती
- नक्सल छाया से निर्यात मॉडल तक अराकू की विकास गाथा
आंध्र प्रदेश। आंध्र प्रदेश की खूबसूरत पर्वतीय श्रृंखलाओं के बीच बसी अराकू घाटी आज देश में आदिवासी सशक्तीकरण और कृषि आधारित विकास का सफल मॉडल बनकर उभरी है। कभी नक्सल गतिविधियों और आर्थिक अभाव के कारण सुर्खियों में रहने वाला यह क्षेत्र अब अपनी जैविक अरेबिका कॉफी के दम पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बना चुका है। विशाखापत्तनम जिले के अंतर्गत आने वाली इस घाटी के 11 मंडलों में फैले लगभग 2.58 लाख एकड़ कृषि क्षेत्र में कॉफी और काली मिर्च की खेती की जा रही है।
यहां की कॉफी अपनी विशिष्ट सुगंध, गहरे स्वाद और पूर्णतः जैविक उत्पादन पद्धति के कारण प्रीमियम श्रेणी में गिनी जाती है। भारतीय कॉफी बोर्ड के अनुसार अराकू की प्रीमियम अरेबिका का लगभग 80 प्रतिशत निर्यात लंदन, फ्रांस सहित कई यूरोपीय देशों में किया जा रहा है। दुबई, सिंगापुर और मध्य-पूर्व में भी नए आउटलेट खोलने की तैयारी है।
आदिवासी मेहनत से बदला आर्थिक परिदृश्य
अराकू की सफलता के केंद्र में यहां के आदिवासी किसान हैं। पौधारोपण से लेकर चेरी तुड़ाई और प्रोसेसिंग तक हर चरण में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संतुलित उपयोग किया जा रहा है। प्रति एकड़ न्यूनतम 50 हजार रुपये तक की आय और एक परिवार की वार्षिक आय 2.5 से 3 लाख रुपये तक पहुंचने लगी है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में स्पष्ट सुधार देखने को मिल रहा है।
केंद्र-राज्य सहयोग से आधुनिकीकरण
काफी उत्पादन को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए केंद्र सरकार उपकरणों की खरीद पर 50 प्रतिशत और राज्य सरकार 35 प्रतिशत तक सब्सिडी दे रही है। इसके चलते किसानों ने पल्पिंग यूनिट, ग्रेडर, ड्राइंग यार्ड और आधुनिक क्योरिंग टेक्नोलॉजी अपनाई है। इससे गुणवत्ता में सुधार हुआ है और वैश्विक मानकों को हासिल करना आसान हुआ है।
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नक्सल प्रभाव से विकास मॉडल तक
एक समय नक्सल गतिविधियों के कारण असुरक्षा और पिछड़ेपन का प्रतीक रहा अराकू आज स्थायी आजीविका और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था का उदाहरण बन गया है। कॉफी आधारित कृषि मॉडल ने क्षेत्र में सामाजिक स्थिरता और आर्थिक आत्मनिर्भरता को नई दिशा दी है।
विस्तार की योजना
काफी बोर्ड अगले वर्ष एक लाख एकड़ अतिरिक्त भूमि को कॉफी क्षेत्र में शामिल करने की योजना पर काम कर रहा है। इससे हजारों नए परिवारों को रोजगार और आय के अवसर मिलेंगे।
उत्तराखंड के लिए सीख
उत्तराखंड में भी कॉफी उत्पादन की संभावनाओं को लेकर अध्ययन हुआ है, लेकिन वहां का कम तापमान (चिलिंग प्वाइंट) बड़े पैमाने पर कॉफी उत्पादन में बाधा माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार 15 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान आवश्यक है, जो पहाड़ी राज्यों में लंबे समय तक उपलब्ध नहीं रहता। अराकू घाटी की यह कहानी दर्शाती है कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग, सरकारी सहयोग और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो, तो कोई भी क्षेत्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकता है।








