
यह आलेख आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका, संघर्ष और उपेक्षा का गहन विश्लेषण करता है। लेखिका तर्क देती हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रीढ़ कही जाने वाली इन महिलाओं को स्वयंसेवक कहकर श्रम अधिकारों से वंचित रखना सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता का गंभीर उल्लंघन है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य की रीढ़ और अधिकारों से वंचित महिलाएँ
- स्वयंसेवक या पूर्णकालिक श्रमिक?
- आशा-आंगनवाड़ी आंदोलन और राज्य की जिम्मेदारी
- महिला श्रम, सामाजिक न्याय और संवैधानिक सवाल
डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत के ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण, पोषण और स्वास्थ्य काफी हद तक आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर निर्भर करता है। ये वे महिलाएँ हैं जो घर-घर जाकर टीकाकरण करती हैं, बच्चों में कुपोषण का पता लगाती हैं, गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव में सहायता करती हैं और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कोविड-19 जैसी महामारी में इन्हें अग्रिम पंक्ति के सैनिकों की तरह इस्तेमाल किया गया था, लेकिन आजकल ये महिलाएँ सड़कों पर हैं। उनका गंतव्य पश्चिम बंगाल का सियालदह रेलवे स्टेशन या कर्नाटक का फाउंटेन चौक है। उनकी स्थिति भी बेहतर नहीं है। क्या राष्ट्र के स्वास्थ्य की देखभाल करने वाली इन महिलाओं को श्रमिक का दर्जा नहीं दिया जाएगा?
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आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की ज़रूरतें असाधारण नहीं हैं; वे न्यूनतम वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी, तृतीय श्रेणी कर्मचारी का दर्जा और सामाजिक सुरक्षा चाहती हैं। फिर भी सरकारें उन्हें औपचारिक श्रम अधिकारों से वंचित रखती हैं और स्वयंसेवक या परियोजना कार्यकर्ता कहती हैं। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 तक हुई देशव्यापी हड़तालें इस दीर्घकालिक उपेक्षा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति हैं। सन् 1975 में आईसीडीएस और सन् 2005 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आंगनवाड़ी और आशा योजनाएँ शुरू की गईं। उद्देश्य स्थानीय महिलाओं की भागीदारी से ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण प्रणालियों को सशक्त बनाना था। शुरुआत में सरकारी खर्च सीमित रखने के लिए स्वैच्छिक व्यवस्था अपनाई गई, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये महिलाएँ पूर्णकालिक कामगारों की तरह कार्यरत हैं।
एक आशा कार्यकर्ता को लगभग 1,000 लोगों की देखभाल करनी होती है, जबकि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं के साथ-साथ 40 बच्चों की देखभाल, पोषण वितरण और रिकॉर्ड रखने का कार्य करती है। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि वैधानिक पद न होने के कारण वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, लेकिन इस फैसले ने उनकी स्थिति को और असुरक्षित बना दिया। 2022 में एक अन्य फैसले में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को 2013 के आईसीडीएस अधिनियम के तहत ग्रेच्युटी का अधिकार दिया गया। 2024 में गुजरात उच्च न्यायालय ने समानता के सिद्धांत के आधार पर उन्हें राज्य कर्मचारी के रूप में स्वीकार किया, जबकि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पदोन्नति के मुद्दे पर विचार करने का निर्देश दिया। इसके बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियाँ असंगत बनी हुई हैं।
मानदेय की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। आशा कार्यकर्ताओं को 3,500 से 6,000 रुपये के बीच मानदेय मिलता है, वह भी प्रोत्साहन-आधारित। कर्नाटक में 6,000 रुपये निर्धारित हैं, लेकिन भुगतान आठ-नौ महीने देरी से होता है। आंगनवाड़ी पर्यवेक्षकों को औसतन 15,000 रुपये मिलते हैं। न अवकाश, न परिवहन भत्ता, न पर्याप्त व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण। मातृत्व अवकाश सीमित है और कार्यभार लगातार बढ़ रहा है। स्वयंसेवक कहे जाने के कारण वे न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 और चार नए श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हैं। 45वें भारतीय श्रम सम्मेलन द्वारा सुझाई गई 26,000 रुपये न्यूनतम मजदूरी अब तक लागू नहीं हुई है। ईपीएफ, ईएसआई जैसी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। सेवानिवृत्ति पेंशन में 1,200 रुपये की वृद्धि की मांग वर्षों से लंबित है। ई-श्रम कार्ड केवल डेटा संग्रह तक सीमित है।
विडंबना यह है कि कुपोषण और शिशु मृत्यु दर कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महिलाएँ स्वयं असुरक्षित हैं। एनएफएचएस-5 के अनुसार 35 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं और शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 28 है। कोविड-19 के दौरान 500 से अधिक कार्यकर्ता शहीद हुईं। मुआवज़े की घोषणा तो हुई, लेकिन भुगतान में भारी देरी हुई। मानसिक तनाव, रिक्त पद और बढ़ता कार्यभार स्थिति को और गंभीर बना रहा है। यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर भी उठाया गया। 16 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में सोनिया गांधी ने इसे सामने रखा। बजट 2026 में संकेत दिए गए, पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। यूनियनों ने स्पष्ट किया है कि मांगें पूरी न होने पर आंदोलन तेज होगा।
समाधान ढांचागत होने चाहिए। योजना कर्मियों को श्रम कानूनों के तहत कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। न्यूनतम वेतन 26,000 रुपये, पेंशन 10,000 रुपये और ईपीएफ अनिवार्य हो। केंद्र सरकार कम से कम 50 प्रतिशत मानदेय वहन करे। रिक्त पद भरे जाएँ, मातृत्व अवकाश, स्थायी कार्यस्थल, प्रशिक्षण और यूनियन मान्यता सुनिश्चित हो। पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेही तय की जाए। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताएँ किसी योजना की पूरक नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्हें स्वयंसेवक कहकर श्रम अधिकारों से वंचित करना सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता का अपमान है। गणतंत्र के 77वें वर्ष में यह प्रश्न केवल नीतिगत नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक है। ये प्रदर्शन चेतावनी हैं—न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन उससे बचा नहीं जा सकता।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक)
स्तंभकार, उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)में भी तैयार कर सकता हूँ।






