
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने चीनी राजदूत को तीस्ता परियोजना क्षेत्र का दौरा कराकर भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक चीन की एंट्री को भारत के खिलाफ रणनीतिक चाल के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में और तनाव आ सकता है।
- तीस्ता परियोजना के बहाने चीन की रणनीतिक एंट्री
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीनी गतिविधि क्यों चिंता का विषय
- भारत–बांग्लादेश के पुराने जल विवाद में नया मोड़
- शेख हसीना के बाद युनूस सरकार की बदली हुई दिशा
नई दिल्ली। बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मुहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार ने हाल ही में ढाका में चीनी राजदूत याओ वेन को तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र का दौरा कराया। यह इलाका भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। सरकार की ओर से दावा किया गया कि यह दौरा केवल तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना के तकनीकी मूल्यांकन तक सीमित था, लेकिन इसके रणनीतिक निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं।
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी का विवाद दशकों पुराना है। यह ऐसा विवाद है, जिसमें अब चीन की एंट्री हो चुकी है। अगर यह परियोजना चीन के हाथों में जाती है, तो इसका असर केवल जल बंटवारे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक और सामरिक सुरक्षा पर भी पड़ेगा। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत को उसके पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाली एकमात्र संकरी पट्टी है, जिसे लेकर चीन पहले से ही संवेदनशील रुचि रखता रहा है।
बांग्लादेश की जल संसाधन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन चीनी राजदूत के साथ रंगपुर के तेपामधुपुर तालुक शाहबाजपुर स्थित परियोजना क्षेत्र पहुंचीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन जल्द से जल्द तीस्ता मास्टर प्लान (TMP) को लागू करने के लिए उत्सुक है। खबरों के मुताबिक, बांग्लादेश ने चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना को दिसंबर 2026 तक रिसर्च पूरी करने और उससे पहले कांसेप्ट नोट सौंपने को कहा है। इसके लिए दोनों पक्षों के बीच समझौता ज्ञापन भी साइन हो चुका है।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब भारत इसी परियोजना को लेकर बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ समझौते के बेहद करीब पहुंच चुका था। लेकिन 2024 में सरकार गिरने के बाद अंतरिम युनूस सरकार ने बिना किसी व्यापक क्षेत्रीय सहमति के चीन को परियोजना में शामिल कर लिया। यही वह बिंदु है, जहां भारत की चिंता स्वाभाविक हो जाती है।
तीस्ता नदी परियोजना क्या है
तीस्ता नदी का उद्गम उत्तरी सिक्किम में करीब 5000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और आगे जाकर ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। नदी की कुल लंबाई लगभग 400 किलोमीटर है, जिसमें से करीब 300 किलोमीटर भारत में और शेष बांग्लादेश में बहती है।
1947 के बाद से ही इसके जल बंटवारे को लेकर विवाद चला आ रहा है, जो 2011 में लगभग सुलझने वाला था, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के चलते यह समझौता अटक गया। 2024 में शेख हसीना की मंजूरी के बाद एक बार फिर उम्मीद जगी थी, लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही तस्वीर पलट गई।
युनूस सरकार द्वारा चीन को इस प्रोजेक्ट में लाना केवल एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला कदम माना जा रहा है। यही वजह है कि भारत में इसे बांग्लादेश द्वारा खेला जा रहा एक खतरनाक रणनीतिक दांव कहा जा रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा पर साफ दिखाई दे सकता है।






