
उत्तराखण्ड के 25 वर्षों में 10 मुख्यमंत्री आए, लेकिन विकास के मूल सवाल आज भी जस के तस हैं। राजधानी, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर जनता में गहरी नाराजगी और असंतोष बना हुआ है।
- भाजपा-कांग्रेस के बीच 25 साल, यूकेडी सत्ता से बाहर क्यों?
- राजधानी, रोजगार और महंगाई—हर मुद्दा आज भी अधूरा
- औसत कार्यकाल घटा, अस्थिर राजनीति ने रोका विकास
- जनता पूछ रही है: क्या विकास रास्ता भूल गया?
राज शेखर भट्ट
उत्तराखण्ड को बने 25 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान राज्य ने 10 मुख्यमंत्री देखे। यदि गणित के हिसाब से देखा जाए तो एक मुख्यमंत्री का औसत पूर्ण कार्यकाल पाँच वर्ष माना जाता है। इस दृष्टि से 10 मुख्यमंत्री का अर्थ होता है 50 वर्षों का शासन अनुभव, लेकिन हकीकत में राज्य के पास सिर्फ 25 साल ही हैं। यही विरोधाभास उत्तराखण्ड की राजनीति की सबसे बड़ी विफलता को उजागर करता है—अस्थिरता, सत्ता की खींचतान और विकास का लगातार भटकना। इन 10 मुख्यमंत्रियों में से 7 भाजपा से और 3 कांग्रेस से रहे। यानी सत्ता का अधिकांश समय भाजपा के पास रहा।
इसके बावजूद जनता आज भी यही पूछ रही है कि यूकेडी कहां है? जिस उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) ने राज्य आंदोलन को जन्म दिया, जिसने पहाड़ की आवाज को दिल्ली तक पहुंचाया, वह सत्ता से पूरी तरह बाहर क्यों है? क्या राज्य निर्माण का सपना केवल राष्ट्रीय दलों के हाथों में सौंप देने के लिए था? या फिर क्षेत्रीय सोच और पहाड़ी मुद्दों को जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया गया? सबसे बड़ा सवाल यह है कि 25 सालों में 10 मुख्यमंत्री आए, लेकिन विकास कहां है? क्या विकास रास्ता भूल गया या फिर उसे जानबूझकर भटका दिया गया? आज भी राज्य स्थायी राजधानी के मुद्दे में उलझा हुआ है।
गैरसैंण को लेकर बड़े-बड़े वादे किए गए, भावनात्मक भाषण दिए गए, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस है। राजधानी का सवाल आज भी अधर में लटका है, जैसे सरकारें इसे हल करना ही नहीं चाहतीं। रोजगार की बात करें तो हालात और भी चिंताजनक हैं। पहाड़ का युवा आज भी नौकरी की तलाश में मैदानों और दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर है। सरकारी भर्तियां या तो वर्षों तक अटकी रहती हैं या फिर विवादों में घिर जाती हैं। पेपर लीक, भर्ती घोटाले और अदालतों के चक्कर युवाओं का भविष्य निगल चुके हैं। सवाल यह है कि इतने मुख्यमंत्रियों के बावजूद स्थायी रोजगार नीति क्यों नहीं बन पाई?
महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक सब कुछ महंगा हो चुका है। लेकिन सरकारों के पास जनता को राहत देने के लिए न कोई ठोस योजना दिखती है, न इच्छाशक्ति। सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, लेकिन आम आदमी की परेशानी नहीं बदली। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पहाड़ों में अस्पताल डॉक्टरों के बिना हैं, स्कूल शिक्षक के बिना। सड़क, पानी और बिजली जैसे मूलभूत मुद्दे आज भी चुनावी भाषणों का हिस्सा बने हुए हैं, समाधान नहीं। अगर 25 साल बाद भी सरकारें इन्हीं मुद्दों पर वादे कर रही हैं, तो यह उनकी सबसे बड़ी नाकामी का प्रमाण है।
जनता की नजर में यह पूरा दौर सत्ता की कुर्सी बदलने का इतिहास बनकर रह गया है, न कि विकास का। भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर आरोप लगाती रहीं, लेकिन दोनों ही जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकीं। और यूकेडी, जो उत्तराखण्ड की आत्मा मानी जाती थी, वह सत्ता की राजनीति से लगभग गायब कर दी गई। आज जनता के मन में गुस्सा, निराशा और सवाल हैं। सवाल यह नहीं है कि कितने मुख्यमंत्री आए, सवाल यह है कि उन्होंने दिया क्या? 25 साल बाद भी अगर राज्य वही सवाल पूछ रहा है—राजधानी कहां, रोजगार कहां, महंगाई पर नियंत्रण कहां—तो यह साफ संदेश है कि उत्तराखण्ड की राजनीति ने विकास को नहीं, बल्कि सत्ता को प्राथमिकता दी।
यह जनता की ओर से एक नकारात्मक नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाई का संदेश है। अगर आने वाले वर्षों में भी यही सिलसिला चलता रहा, तो इतिहास यही लिखेगा कि उत्तराखण्ड को मुख्यमंत्री तो बहुत मिले, लेकिन विकास कभी नहीं मिला
मुख्यमंत्री बदले, सत्ता बदली पर जनता की हालत नहीं बदली
पच्चीस वर्षों में उत्तराखण्ड ने दस मुख्यमंत्री देखे, लेकिन आम जनता की ज़िंदगी में ठोस बदलाव आज भी नजर नहीं आता। सत्ता भाजपा और कांग्रेस के बीच घूमती रही, चेहरे बदलते रहे, नीतियाँ बदलीं, पर ज़मीनी हकीकत वही रही। राजधानी का सवाल अधूरा है, रोजगार के लिए युवा आज भी पलायन को मजबूर हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी, लेकिन राहत देने वाली कोई स्थायी नीति नहीं दिखी। जनता अब पूछ रही है कि जब मुख्यमंत्री और सरकारें बदल गईं, तो उनकी हालत क्यों नहीं बदली?








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