
यह कविता अरावली पर्वत-श्रृंखला की आत्मकथा के माध्यम से मानव को चेतावनी देती है कि अंधाधुंध दोहन विनाश को आमंत्रण है। जल, जंगल, जीवन और पर्यावरण की रक्षा के लिए अरावली को बचाना अनिवार्य है।
- अरावली की पुकार : जीवन की अंतिम चेतावनी
- पर्वत-श्रृंखला का विलाप और मानव की ज़िम्मेदारी
- जल, जंगल और जीवन की रक्षक अरावली
- इतिहास से भविष्य तक : अरावली का संघर्ष
गणपत लाल उदय
मुझे बचाओ, मुझे बचाओ, कोई हमारी आवाज़ सुनो,
भविष्य बचाओ, अपना व मेरा, नहीं कोई जाल बुनो।
जीवन की रेखा कहलाती हूँ, मुझको न आघात करो,
असर इसका भयावह होगा, सुन लो आज सब जनो।
बिलख रही आज, टूट रही, सबको जीवन देने वाली,
न कोख उजाड़ो, हत्यारों में, सबको सुरक्षा देने वाली।
कैसे बचाऊँ मैं जल, जंगल, जीव-जंतु, हरियाली,
आवाज़ बनो, न ख़ामोश रहो, मैं हूँ रक्षक, न काली।
इस दुनिया की पर्वत-श्रृंखला में एक मैं ही ज़िंदा हूँ,
इतिहास में रह जाऊँगी, जो आज ऊँची यह चोटी हूँ।
अभी भी वक्त है, बचा लो मुझको, मैं ज़िंदा वरदान हूँ,
वरना स्वास्थ्य, वायु प्रदूषण, महामारियों का सैलाब हूँ।
भारी पड़ेगा प्रत्येक जीव को मुझसे छेड़छाड़ करना,
जंगल उजाड़कर जल संकट, धूलभरी आँधी सहना।
करोड़ों वर्षों से देती रही मैं, कभी किसी से न लिया,
समय व साम्राज्य बदले, मैं न बदली, भाइयों-बहना।
लिखो लेख, आलेख, कविता, अरावली को न खो देना,
लिखना मेरे गुण-अवगुण, दिया-लिया, सभी लिखना।
लिखना भक्षक कौन थे मेरे, ये भूख लगी, चबा लिया,
दर्दनाक अध्याय है, लेकिन सत्य बात ज़रूर लिखना।
गणपत लाल उदय
अजमेर, राजस्थान








