
राजेश ध्यानी सागर
ये कौन रुलाना
सिखा गया ,
दिन बोलें मैं रात हूं।
अपना है या बैंगाना
क्यूँ मुझमें वो संमा गया।
संमा के मुझ पर
बन्धन ऐसा
लव यू कह कर
सो गया।
झलक भी उसकी
ना दिखें हंसना भी
उसने छोड़ दिया।
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अकण में रहता
समझ न आया
ये कौन न जाने समां गया ।
कभी वो समझें ,
अपना है ,
कभी बैगाना बना दिया ।
मैं तो प्यार की,
दरियां जानूं ,
क्यूँ भंवर में ,
मुझकों फंसा दिया।
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »राजेश ध्यानी “सागर”वरिष्ठ पत्रकार, कवि एवं लेखकAddress »144, लूनिया मोहल्ला, देहरादून (उत्तराखण्ड) | सचलभाष एवं व्हाट्सअप : 9837734449Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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