
देहरादून। एक बेहद चौंकाने वाली और संवेदनशील घटना ने उत्तराखंड की न्याय प्रक्रिया और परिवारिक पहचान की सत्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। डालनवाला कोतवाली क्षेत्र में 2020 में दर्ज एक दुष्कर्म मामले में जिस महिला को मृत बताया गया था, वह अचानक अदालत में पेश हुई। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने पूरे मामले का रुख ही बदल दिया और आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। मामला 18 अप्रैल 2020 का है, जब एक महिला ने अपनी 10 वर्षीय भतीजी के साथ हुए कथित दुष्कर्म की शिकायत डालनवाला कोतवाली में दर्ज कराई थी।
महिला ने तहरीर में आरोप लगाया कि 15 अप्रैल को उसके पति ने उसकी नाबालिग भतीजी के साथ दुष्कर्म किया। पीड़ित बच्ची ने यह घटना आरोपी की मां को बताई थी, जिसके बाद आरोपी की मां ने उसे किचन में बंद कर दिया। घटना के कुछ समय बाद पीड़ित की बुआ आई और पूरे मामले की जानकारी दी। पीड़ित की बुआ और शिकायतकर्ता ने कोर्ट में यह भी बताया कि पीड़ित की मां की मृत्यु हो चुकी है, और बच्ची उनके साथ रहती है। इसी आधार पर प्रारंभिक जांच में महिला को मृत माना गया। इसके चलते आरोपित को गिरफ्तार किया गया और पांच माह जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आया।
मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट (पोक्सो) में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रजनी शुक्ला की अदालत में हुई। अदालत में प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों और गवाहों के बयान में कई विरोधाभास सामने आए। सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब बचाव पक्ष ने पीड़ित की मां को कोर्ट में पेश किया। महिला की उपस्थिति ने अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर कर दिया क्योंकि शिकायतकर्ता ने घटना को अपनी आंखों से नहीं देखा था और तहरीर भी 18 अप्रैल को दी गई थी, जबकि घटना 15 अप्रैल की बताई गई थी।
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अभियोजन पक्ष ने एनजीओ संचालिका को गवाह के रूप में पेश नहीं किया, जिसने तहरीर लिखी थी। इस सबके बीच, अदालत ने सबूतों की कमी और घटना के विवरण में विरोधाभासों को ध्यान में रखते हुए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। इस मामले ने न केवल न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया कि परिवार और पहचान से जुड़े मामलों में गलतफहमी और गलत जानकारी गंभीर परिणाम ला सकती है। न्याय व्यवस्था में सबूतों और गवाहों की विश्वसनीयता पर निर्भरता को स्पष्ट करता यह केस, भविष्य में ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई में सावधानी बरतने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
इस अप्रत्याशित घटना ने समाज में चर्चा का विषय बनते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या कभी-कभी न्याय और सच्चाई की खोज में मानवीय गलतियों का भी असर पड़ सकता है।





