परीक्षा में नकल का बढता गोरखधंधा, जिम्मेदार कौन…?

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सुनील कुमार माथुर

आज इंसान का इतना पतन हो रहा हैं कि वह दूसरों के जीवन से भी खिलवाड करने लगा हैं । आज परीक्षा के पावन मंदिरों में भी विधार्थियों के जीवन से खिलवाड होने लगा हैं । आज परीक्षा केन्द्रों पर अभ्यर्थियों की जगह दूसरें छात्र- छात्राएँ बैठकर परीक्षा दे रहें है । परीक्षा से पहलें ही पेपर आउट हो रहें है । लाखों रुपयों में प्रश्न पत्रों के हल (उतर) बिक रहें है । यहीं वजह है कि आज शिक्षा के पावन मंदिर बदनाम हो रहें है चूंकि इन आपराधिक कृत्यों में शिक्षकों की भूमिका व वहां के कार्मिकों का भी हाथ होता हैं अन्यथा ऐसे आपराधिक गतिविधियों का होना असंभव कार्य हैं ।

परीक्षा के नाम पर प्रतिभावान विधार्थियों के जीवन से खिलवाड हो रहा हैं और सरकार मूक दर्शक बनी सब कुछ देखती रहती हैं । पेपर आउट होने पर , बडे स्तर पर नकल होने पर परीक्षा पुनः कराना कोई समस्या का समाधान नहीं हैं जैसे – जैसे समाज में नई तकनिकी का विकास हो रहा हैं वैसे ही वैसे उसके दुष्परिणाम सामने आ रहे है । नकल की बढती प्रवृत्ति के कारण विधार्थियों के जीवन से खिलवाड हो रहा हैं । प्रतिभाशाली विधार्थी पिछड़ते जा रहें है और कमजोर विधार्थी नकल का सहारा लेकर प्रतिभाशाली विधार्थियों से अधिक अंक लाकर प्रतिभाशाली विधार्थियों के जीवन से खिलवाड कर रहें है । सामान्य वर्ग के विधार्थियों के साथ तो आरक्षण पहले ही खिलवाड कर रहा हैं और ऊपर से नकल की यह बढती प्रवृत्ति उन्हें हताश व निराश कर रही हैं ।

शर्म की बात तो यह हैं कि नकल कराने वाले दलाल शिक्षा के पावन मंदिरों की छवि को खराब होने से भी नहीं डरते । चूंकि उनके लिए पैसा ही माई बाप बन गया हैं । सरकार नकल की प्रवृत्ति को रोकने के लिए सख्त से सख्त कदम उठाये व दोषी लोगों को कठोर से कठोर दंड दे ताकि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो । वहीं दूसरी ओर आरक्षण को खत्म किया जायें ताकि जो प्रतिभाशाली होगा वही अपना हुनर दिखाकर आगे बढ जायेंगा ।

अतः अभिभावकों व शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों को गलत मार्ग पर जाने से रोके व कभी भी उनके गलत कार्यों में सहयोग न करें। वहीं नकल की बढती प्रवृत्ति को रोकने के लिए उचित कदम उठाये…

सरकार एक तरफ समानता के अधिकारों की बात करती हैं वहीं दूसरी ओर आरक्षण को बढाकर निम्न व उच्च वर्ग का भेदभाव कर रही हैं जो आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था में कदापि उचित नहीं कहा जा सकता । अभिभावकों को भी चाहिए कि वे अपने बच्चों को पढाये लिखाये ताकि वे अपना हुनर दिखा कर आगे बढ सके । लाखों रुपये खर्च कर बच्चों को जो पास कराते हैं वे बच्चे आगें जाकर भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं चूंकि वे खुद पैसा देकर पास हुए व इस पद को प्राप्त किया हैं । अतः वे यह राशि ब्याज सहित वसूलने के लिए भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं ।

अतः अभिभावकों व शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों को गलत मार्ग पर जाने से रोके व कभी भी उनके गलत कार्यों में सहयोग न करें । वहीं नकल की बढती प्रवृत्ति को रोकने के लिए उचित कदम उठाये ताकि शिक्षा के पावन मंदिरों की छवि को खराब होने से बचाया जा सकें व शिक्षकों की भी गरिमा बनी रहें । शिक्षक ही वह जौहरी हैं जो विधार्थियों को आदर्श संस्कार व अच्छी शिक्षा देकर विधार्थियों में से हीरे को तराशता हैं । शिक्षक ही विधार्थियों को अपने लक्ष्य को हासिल करने का सही मार्ग दिखाता है फिर यह नकल की प्रवृत्ति क्यों? शिक्षकों को चाहिए कि वह नकल को बढावा देने वालें शिक्षकों का बहिष्कार करें और शिक्षक समुदाय को कलंकित होने से बचाये ।

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