- छुक-छुक करती रेल
- बच्चों की रेल यात्रा
- रेल के सफर में खुशियाँ अपार
- गाँव-शहर जोड़ती भारतीय रेल
डॉ. प्रियंका सौरभ
छुक-छुक करती रेल है, लेकर नई उमंग।
बच्चे बैठे खिड़कियों, इक दूजे के संग॥
लाल-हरी ये रेल है, डिब्बे लगे कतार।
सीटी देकर चल पड़ी, सबको किए सवार॥
इंजन आगे दौड़ता, पीछे डिब्बे साथ।
खेत-खलिहान दिखते, पकड़े जैसे हाथ॥
छुक-छुक करती रेल ने, पकड़ी अपनी चाल।
पेड़-पहाड़ों बीच में, दृश्य बड़े खुशहाल॥
कोई जाता नानके, कोई जाता गाँव।
रेल सफर में खिल उठे, बच्चों के सब भाव॥
खिड़की से दिखते हुए, नदियाँ, खेत, मकान।
चलती-फिरती रेल में, खुश होता मन-प्राण॥
टिकट लेकर बैठिए, रखें नियम का ध्यान।
सुरक्षित यात्रा कीजिए, यही समझ की शान॥
भारत की यह रेल है, करती सबका काम।
दूर-दूर तक जोड़ती, गाँव-शहर के धाम॥
छुक-छुक करती रेल से, गूँजे मीठे बोल।
बचपन की इस रेल में, खुशियाँ हैं अनमोल॥
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर
हिसार (हरियाणा)



