साहित्य लहर
धैर्य

कविता नन्दिनी
उलझनों के जंगल में
धैर्य डगमगाता है
ज़िंदगी की राहों में
उलझनों से नाता है।।
हम सब तो मुसाफिर हैं
साथ-साथ चलना है
ग़म हो या ख़ुशी लोगों
इसी में तो पलना है।।
उलझनें हैं कुछ सब की
कुछ महज हमारी हैं
धैर्य साथ दे-दे तो
ज़िंदगी ये प्यारी हैं।।
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क्या करे कोई यारों
बेख़ुदी का आलम है
भीगी-भीगी पलकों में
ख़्वाब झिलमिलाता है।।
सहमी-सहमी सांसें हैं
इन ग़मों के झोंकों में
धैर्य जैसे जुगनू-सा
दूर टिमटिमाता है।।
¤ प्रकाशन परिचय ¤
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From »कविता नन्दिनीकवयित्रीAddress »सिविल लाइन, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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