
प्रेम बजाज
लिखने बैठा ताबीर तुम्हारी,
शब-ए-हिज्रा में जागा किए,
सोये एक पल को नहीं,
बनाने लगा तस्वीर तुम्हारी,
सूरत मुझको याद नहीं।
ना जाने क्या हो चला मुझे,
लिखने को कलम उठाई तो,
स्याही कहां रख दी ये भी याद नहीं,
दिल का कागज लगा ढूंढने,
दिल भी तो मिला नहीं,
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करता हूं कोशिश मन के भाव
समझाऊं तुमको, मन तो मेरे पास नहीं।
ऑंखों से बहते पानी को स्याही बनाऊं,
ऑंखों में तुम बसे हो पानी नहीं।
ज़ख़्म जो मेरे रिसते है,वो तुम्हारे दिये
ही तो है, वो ज़ख़्म दिखाना चाहता नहीं।
खुद को भूल गया मैं चाहे,
भूला नहीं कुछ लिखना अभी मैं।
बस थोड़ा सा बिखर गया हूं,
कोई समेटे आ कर मुझे तो,
फिर से पूरा हो जाऊंगा,
फिर से मैं तस्वीर घड़ूंगा,
फिर से मैं लिख पाऊंगा,
हां फिर से मैं लिख पाऊंगा।
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